नई दिल्ली: देश की शीर्ष अदालत ने धर्म परिवर्तन और जातिगत पहचान को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट कर दिया कि यदि अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलकर ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और विशेषाधिकारों का हकदार नहीं रह जाएगा। जस्टिस की दो जजों की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमें कहा गया था कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद व्यक्ति अपनी मूल जातिगत पहचान खो देता है।
क्या था पूरा विवाद? पादरी की शिकायत और ‘जाति’ का पेच
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत दिसंबर 2020 में हुई थी। चिंथड़ा आनंद नाम के एक ईसाई पादरी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें ‘मडिगा’ जाति (जो कि एक अनुसूचित जाति है) के नाम पर गालियां दीं। आनंद ने आरोपियों के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया। मामला तब पलट गया जब अभियुक्तों ने दलील दी कि चिंथड़ा आनंद पिछले कई वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं और एक पादरी के रूप में कार्यरत हैं। उनका कहना था कि चूंकि आनंद अब हिंदू नहीं रहे, इसलिए उन पर यह विशेष कानून लागू ही नहीं होता। इसी दलील को लेकर मामला आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा, जिसने अप्रैल 2025 में आनंद की शिकायत को खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: ईसाई धर्म में ‘जाति’ का कोई स्थान नहीं
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ चिंथड़ा आनंद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी दलील थी कि जाति जन्म से तय होती है और धर्म बदलने से ऐतिहासिक भेदभाव खत्म नहीं हो जाता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने 1950 के संवैधानिक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में आ सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईसाई धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें जाति व्यवस्था का प्रावधान नहीं है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ईसाई बनता है, तो वह खुद को अनुसूचित जाति का बताकर इस विशेष कानून का सहारा नहीं ले सकता।
आरक्षण और कानूनी लाभ पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल अपराधों से सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे मायने हैं। अदालत ने साफ किया कि ‘अनुसूचित जाति को मिलने वाला कोई भी कानूनी लाभ, आरक्षण या अन्य फायदे उन लोगों को नहीं मिल सकते जो 1950 के संवैधानिक आदेश के दायरे से बाहर हैं।’ वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि कोई दलित व्यक्ति इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता है, तो उसे SC को मिलने वाला आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। हालांकि, केंद्र सरकार की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे लोगों को ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन उन्हें SC की तरह संसद में आरक्षण या प्रताड़ना के खिलाफ कड़े कानूनों का संरक्षण नहीं मिलता।
केजी बालाकृष्णन समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं निगाहें
यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से हमेशा संवेदनशील रहा है। 2004 से ही सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लंबित है जिसमें मांग की गई है कि दलित ईसाइयों और मुसलमानों को भी SC का दर्जा दिया जाए। साल 2022 में केंद्र सरकार ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है, जो इस बात का अध्ययन कर रही है कि क्या धर्म परिवर्तन करने वालों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं। इससे पहले 2007 की जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने भी इन्हें शामिल करने का सुझाव दिया था, जिसका केंद्र सरकार विरोध करती रही है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले ने धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए कानूनी रास्तों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
रंगनाथ मिश्रा कमेटी बनाम केंद्र सरकार का रुख
यह विवाद नया नहीं है। साल 2007 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सिफारिश की थी कि अनुसूचित जाति का दायरा धर्म से ऊपर उठकर होना चाहिए। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि दलितों के साथ होने वाला सामाजिक भेदभाव केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलित भी इसी तरह की सामाजिक प्रताड़ना झेलते हैं। हालांकि, तत्कालीन और वर्तमान केंद्र सरकारों ने इस आधार पर इसका विरोध किया है कि ईसाई और इस्लाम धर्म सैद्धांतिक रूप से समानता की बात करते हैं और वहां ‘छुआछूत’ जैसी कुप्रथा के लिए कोई स्थान नहीं है।
केजी बालाकृष्णन समिति: क्या बदल जाएगी आरक्षण की परिभाषा?
वर्तमान में पूरे देश की नजरें पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली समिति पर टिकी हैं। साल 2022 में केंद्र सरकार द्वारा गठित यह तीन सदस्यीय समिति इस बात का गहन अध्ययन कर रही है कि क्या उन लोगों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है जो ऐतिहासिक रूप से दलित थे लेकिन अब ईसाई या इस्लाम धर्म अपना चुके हैं।
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समिति का कार्य: यह समिति धर्म परिवर्तन के बाद आने वाले सामाजिक और आर्थिक बदलावों का आकलन कर रही है।
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बड़ा सवाल: क्या ईसाई बनने के बाद भी व्यक्ति का सामाजिक स्तर (Social Status) वही रहता है? समिति इसी सवाल का जवाब तलाश रही है, जिसकी रिपोर्ट आने वाले समय में आरक्षण की नई परिभाषा तय कर सकती है।
राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दलित संगठनों और धार्मिक संस्थाओं में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह फैसला उन लोगों के साथ अन्याय है जो धर्म बदलने के बाद भी अपनी बस्ती और समाज में ‘अछूत’ ही समझे जाते हैं। वहीं, दूसरा पक्ष (विशेषकर मौजूदा SC समुदाय) इस बात का विरोध कर रहा है कि यदि ईसाई और मुस्लिमों को भी इस कोटे में शामिल किया गया, तो मूल अनुसूचित जातियों के हक और आरक्षण का हिस्सा कम हो जाएगा।
2004 से लंबित याचिका पर क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट में साल 2004 से एक मुख्य याचिका लंबित है, जिसमें 1950 के उस संवैधानिक आदेश को चुनौती दी गई है जो केवल तीन धर्मों के दलितों को ही SC का दर्जा देता है। मंगलवार के फैसले ने एक तरह से 1950 के आदेश को फिर से मजबूती प्रदान की है। अब सारा दारोमदार केजी बालाकृष्णन समिति की अंतिम रिपोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले पर है। तब तक के लिए यह स्पष्ट है कि यदि आप ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाते हैं, तो आपको अनुसूचित जाति को मिलने वाले विशेष कानूनी और संवैधानिक लाभों से वंचित रहना होगा।


