उत्तर प्रदेश के Saharanpur से इस वक्त एक बहुत बड़ी कानूनी खबर आ रही है, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। शहर के कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर बनी एक काफी पुरानी मस्जिद को लेकर स्थानीय प्रशासन ने बहुत सख्त रुख अपनाया है। नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए इसे सरकारी जमीन पर किया गया अवैध निर्माण माना है। कोर्ट ने साफ तौर पर आदेश जारी करते हुए मस्जिद प्रबंधन और उससे जुड़े पक्षों को जगह खाली करने के लिए एक महीने यानी 30 दिनों का समय दिया है। अगर तय समय में यह जगह खाली नहीं की जाती है, तो प्रशासन अपने स्तर पर बलपूर्वक कार्रवाई करेगा।
जानिए किस कानून के तहत हुई यह पूरी कार्रवाई
Saharanpur कलेक्ट्रेट के अंदर बनी इस मस्जिद को लेकर काफी समय से कानूनी बहस चल रही थी। यह पूरा मामला नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम के तहत चल रहा था। मामले की बारीकी से जांच करने के लिए कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों की दलीलें सुनीं और इलाके के पुराने सरकारी कागजातों को खंगाला। इन सारे राजस्व रिकॉर्ड्स और साक्ष्यों को देखने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि जिस जमीन पर यह धार्मिक ढांचा खड़ा है, वह असल में सरकारी संपत्ति है और वहां बिना किसी आधिकारिक अनुमति के निर्माण कार्य किया गया था।
पैमाइश में सामने आई जमीन की हकीकत
नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में जमीन के सरकारी आंकड़ों का हवाला दिया है। आदेश के मुताबिक, कलेक्ट्रेट परिसर की खसरा संख्या-539 पूरी तरह से सरकारी कागजों में कचहरी और कलेक्ट्रेट के नाम पर ही दर्ज है। जब इस जमीन की पैमाइश की रिपोर्ट देखी गई, तो पता चला कि इसके करीब 315 वर्ग मीटर हिस्से पर मस्जिद बनी हुई है। कोर्ट ने इसी रिपोर्ट को आधार मानते हुए इसे अनधिकृत कब्जा घोषित किया और वहां रहने या उसका प्रबंधन संभालने वालों को 30 दिन के भीतर खुद ही सारा ढांचा हटाने को कहा है।
बड़ी धनराशि की वसूली का भी निर्देश
इस मामले में कोर्ट ने केवल कब्जा हटाने का निर्देश ही नहीं दिया है, बल्कि एक बहुत बड़ी आर्थिक पेनाल्टी भी लगाई है। अदालत ने अवैध कब्जे के लिए 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी ठोंका है। सटीक रूप से कहें तो यह राशि 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये तय की गई है और प्रशासन से कहा गया है कि वे नियमानुसार इसकी वसूली की प्रक्रिया शुरू करें। इस पूरे विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की एक शिकायत के बाद हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि परिसर का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों और डाकघर चलाने के लिए भी हो रहा है, जिसके बाद इसकी जांच शुरू हुई थी।
राजस्व विभाग के दस्तावेजों से तय हुआ मामला
इस पूरे केस में सबसे बड़ी भूमिका कागजी सबूतों की रही है। कोर्ट ने अपने फैसले में यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि सरकारी रिकॉर्ड बने फैसले का आधार हैं। कानून के जानकारों का भी यही कहना है कि जब बात सरकारी जमीनों पर बने किसी भी तरह के निर्माण की आती है, तो अदालतें पूरी तरह से राजस्व अभिलेखों और सरकारी नक्शों पर ही भरोसा करती हैं। सार्वजनिक परिसर अधिनियम के नियमों के तहत ही यह पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ी है। अब हर किसी की नजरें कोर्ट द्वारा दी गई 30 दिनों की इस समय-सीमा पर टिकी हैं कि आगे प्रशासन इस पर क्या कदम उठाता है।
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