भारत के आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर Odisha राज्य से एक बहुत ही सुकून भरी और बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य में पिछले कई दशकों से सक्रिय और पुलिस की 'मोस्ट वॉन्टेड' लिस्ट में शामिल खूंखार नक्सल नेता सुकरू उर्फ कोशा सोढ़ी ने आखिरकार हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। सुकरू पर सरकार ने 55 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम रखा था। उसने न केवल खुद हथियार डाले, बल्कि अपने चार अन्य साथियों और एक घातक AK-47 राइफल के साथ कंधमाल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। Odisha के नक्सल विरोधी अभियान के लिए इसे इस साल की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा रहा है।
सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव ने बदला सुकरू का इरादा
ओडिशा के एडीजी (नक्सल विरोधी अभियान) संजीव पांडा ने इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि सुकरू काफी समय से पुलिस की रडार पर था। पिछले कुछ महीनों से कंधमाल, रायगढ़ और कालाहांडी के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने जिस तरह से ड्रोन निगरानी और गश्त बढ़ाई थी, उससे नक्सलियों के छिपने के ठिकाने खत्म होते जा रहे थे। Odisha पुलिस के लगातार बढ़ते दबाव और परिवार की ओर से की गई भावुक अपीलों ने सुकरू को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हिंसा की इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है। सुकरू मलकानगिरी जिले का रहने वाला है और वह संगठन के भीतर एक बहुत ही वरिष्ठ पद पर था।
संगठन के भीतर का आपसी कलह भी बना बड़ी वजह
पुलिस जांच में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। सुकरू खुद अपने संगठन के उन सदस्यों के लिए दीवार बना हुआ था जो सरेंडर करना चाहते थे। इसी साल जनवरी में उसने अपने ही एक जूनियर साथी अन्वेश की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी थी क्योंकि वह पुलिस के पास जाना चाहता था। ओडिशा के जंगलों में सक्रिय इस गिरोह के भीतर धीरे-धीरे अविश्वास की भावना पैदा होने लगी थी। जब सुकरू को लगा कि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा है और उसके अपने ही साथी उसके खिलाफ हो सकते हैं, तो उसने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया।
माओवादी-मुक्त बनने की दिशा में बढ़ता कदम
Odisha सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 31 मार्च 2026 तक राज्य को पूरी तरह से माओवादी-मुक्त बना दिया जाए। हाल के दिनों में जिस तरह से बड़े नक्सलियों ने सरेंडर किया है, उससे यह लक्ष्य अब काफी करीब नजर आ रहा है। 11 मार्च को सानू पोट्टम और फिर 15 मार्च को नकुल जैसे कमांडरों के सरेंडर के बाद अब सुकरू का हथियार डालना नक्सलियों की कमर तोड़ने जैसा है। Odisha पुलिस का मानना है कि जब सुकरू जैसा वरिष्ठ नेता हिंसा का रास्ता छोड़ता है, तो नीचे काम करने वाले कैडरों का मनोबल पूरी तरह टूट जाता है।
पुनर्वास नीति का लाभ उठाकर नई जिंदगी की शुरुआत
राज्य सरकार की सरेंडर और पुनर्वास नीति ओडिशा में काफी कारगर साबित हो रही है। हथियार डालने वाले नक्सलियों को न केवल आर्थिक सहायता दी जाती है, बल्कि उन्हें समाज में फिर से बसने के लिए मकान और रोजगार के अवसर भी प्रदान किए जाते हैं। अधिकारियों को उम्मीद है कि सुकरू को देखकर जंगलों में छिपे बाकी नक्सली भी हिंसा छोड़कर अपने परिवारों के पास लौट आएंगे। Odisha के दुर्गम इलाकों में अब शांति की बहाली की उम्मीदें और भी मजबूत हो गई हैं।
Odisha में सुकरू का सरेंडर करना शांति की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। हिंसा कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती और यह बात अब जंगलों में सक्रिय गुमराह युवाओं को भी समझ आने लगी है। पुलिस और सुरक्षा बलों की यह रणनीति वाकई काबिल-ए-तारीफ है कि उन्होंने बिना खून बहाए इतने बड़े इनामी अपराधी को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया।
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