नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स‘ (पूर्व में ट्विटर) पर संस्कृत के एक अत्यंत पावन और ऊर्जावान सुभाषितम् को साझा किया है। इस श्लोक के माध्यम से उन्होंने मातृभूमि और पृथ्वी की अनंत शक्ति को राष्ट्र की उन्नति का मुख्य आधार बताया है। साझा किया गया यह सुभाषितम् मूलतः अथर्ववेद के ‘भूमि सूक्त’ से लिया गया है, जो हमारी धरती के प्रति सम्मान और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री ने अपनी पोस्ट में इस बात पर जोर दिया कि सदियों से भारतीय विद्वानों और मनीषियों ने जिस पावन भूमि की वंदना की है, वही हमारी ऊर्जा और शक्ति का शाश्वत केंद्र है।
सुभाषितम् और उसका आध्यात्मिक अर्थ
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया सुभाषितम् इस प्रकार है:
“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”
सरल हिंदी अर्थ: यह पृथ्वी, जो सृष्टि के प्रारंभ में महासागरों के अथाह जल के रूप में विद्यमान थी और आज भी जल से परिपूर्ण है; जिसे विद्वानों ने अपनी ज्ञान-दृष्टि और साधना से आत्मसात किया है; और जिसका हृदय अनंत आकाश में शाश्वत सत्य और अमृतत्व से ओत-प्रोत है—वह पावन पृथ्वी एक महान राष्ट्र के रूप में हमें असीम ऊर्जा और शक्ति प्रदान करती रहे।
यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।
यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।
सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥ pic.twitter.com/mfz8yB6SIq
— Narendra Modi (@narendramodi) March 10, 2026
‘भूमि सूक्त’ और राष्ट्रवाद का दर्शन
अथर्ववेद का यह मंत्र केवल धार्मिक श्लोक नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गहरी समझ प्रस्तुत करता है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने संबोधनों में “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ) का उल्लेख करते रहे हैं। इस सुभाषितम् को साझा करने के पीछे का उद्देश्य आधुनिक भारत के विकास को अपनी प्राचीन जड़ों और प्रकृति के प्रति सम्मान से जोड़ना है।
प्रधानमंत्री की यह पोस्ट संदेश देती है कि भारत का उदय और उसकी शक्ति का विस्तार केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सत्य और ज्ञान पर आधारित है जिसे हमारे पूर्वजों ने पहचाना था।
जल, ज्ञान और शक्ति का समन्वय
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए अर्थ में तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है:
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प्राकृतिक संपदा (जल): पृथ्वी की उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति।
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मनीषियों का ज्ञान: वह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि जिसने भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाया।
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शक्ति का संकल्प: एक ‘उत्तम राष्ट्र’ के रूप में भारत की ऊर्जा और बल को अक्षुण्ण बनाए रखने की प्रार्थना।
वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति का गौरव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निरंतर वैश्विक पटल पर भारतीय उपनिषदों और वेदों की सूक्तियों को साझा कर देश की सॉफ्ट पावर को मजबूत कर रहे हैं। इस पोस्ट के जरिए उन्होंने एक बार फिर देशवासियों को अपनी विरासत पर गर्व करने और प्रकृति के संरक्षण के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया है।
यह सुभाषितम् ऐसे समय में साझा किया गया है जब भारत जी-20 की अध्यक्षता के बाद ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ (One Earth, One Family, One Future) के मंत्र को पूरी दुनिया में फैला रहा है। पृथ्वी को शक्ति का स्रोत मानना भारतीय जीवन दर्शन का मूल मंत्र है, जिसे प्रधानमंत्री ने डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है।