उत्तर प्रदेश के Aligarh जिले में बंजर और अनुपजाऊ भूमि का उर्वर भूमि में रूपांतरण एक अद्वितीय सफलता की कहानी है। जहां कभी घास भी नहीं उगती थी, आज वहां धान, गेहूं और आलू जैसी फसलों की खेती हो रही है। यह सफलता किसानों, कृषि विशेषज्ञों और सरकारी योजनाओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है, जिन्होंने मिलकर इस असंभव कार्य को संभव बना दिया।
चुनौती: बंजर भूमि और किसानों पर इसका प्रभाव
अलीगढ़ जिले के कुछ क्षेत्रों जैसे इगलास, गंगीरी, लोधा और बिजौली में लगभग 6000 हेक्टेयर बंजर भूमि थी, जो किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। इस भूमि पर खेती करना लगभग असंभव था। यहां का मृदा संरचना इतनी खराब थी कि इसमें घास तक नहीं उगती थी। इस कारण किसान निराश हो चुके थे और इस भूमि को छोड़ने के बारे में सोच रहे थे।
किसानों ने बहुत प्रयास किए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। यहां के मिट्टी में सोडियम की मात्रा अधिक थी, जो भूमि को अनुपजाऊ बना देती थी। कई सालों तक किसानों ने हार मान ली थी, और यह भूमि खाली पड़ी रही।
सरकारी पहल: सोडिक भूमि सुधार परियोजना
2012 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सोडिक भूमि सुधार परियोजना की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य बंजर और जलमग्न भूमि को उपजाऊ बनाना था। इस परियोजना में रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट मैपिंग का उपयोग करके अलीगढ़ जिले के 28 गांवों में 2855 हेक्टेयर बंजर भूमि का चयन किया गया। इसके तहत मिट्टी के सुधार के लिए कई प्रभावी कदम उठाए गए, जिनमें सोडियम की मात्रा को कम करना, जमीन की उर्वरता बढ़ाना, और किसानों को उचित तकनीकी सहायता प्रदान करना शामिल था।
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भूमि सुधार के तीन चरण
भूमि सुधार का कार्य तीन चरणों में किया गया:
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समतलकरण और मेड़बंदी:
पहले चरण में भूमि को समतल किया गया और मेड़बंदी की गई, ताकि पानी का संचय सही तरीके से हो सके और जलजमाव की समस्या से बचा जा सके। -
जैविक खाद से भूमि सुधार:
दूसरे चरण में पुआल को खेतों में बिछाया गया और उसे सड़ने दिया गया, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ी और सोडियम की मात्रा कम हुई। इस प्रक्रिया से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ और भूमि उपजाऊ बनने लगी। -
गहरी जुताई और हरी खाद का उपयोग:
तीसरे चरण में गहरी जुताई कराकर ढेंचा की बुवाई की गई। ढेंचा पौधा मिट्टी से नाइट्रोजन अवशोषित करता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है। इसके बाद गेहूं और धान की खेती शुरू की गई।
इन तीन चरणों को नियमित रूप से दोहराया गया, और परिणामस्वरूप भूमि में सुधार हुआ और वह खेती के लिए उपयुक्त बन गई।
कृषि उत्पादन में वृद्धि: एक नई शुरुआत
2018 तक, परियोजना ने 1165 हेक्टेयर भूमि को उपजाऊ बना लिया था, और अब किसान धान, गेहूं और आलू जैसी फसलों की खेती कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि पहले जिन खेतों में कुछ भी नहीं उगता था, वहां अब प्रति बीघा 2.5 क्विंटल धान और चार बीघा प्रति क्विंटल गेहूं की पैदावार हो रही है। यह सफलता किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।
पंडित दीनदयाल किसान समृद्धि योजना: भविष्य की दिशा
2022 से 2026 तक पंडित दीनदयाल किसान समृद्धि योजना के तहत प्रदेश के 74 जिलों में भूमि सुधार के कार्य जारी हैं। इस योजना में भी इससे मानपुर, भौरा गौरवा, शहरी मदनगढ़ी, कलंजरी, गढ़ी धनु, मोहकमपुर, हरौथा, अमरपुर नेहरा, गंगीरी, बिजौली आदि गांवों में 815 हेक्टेयर भूमि को पहले ही उपजाऊ बना लिया गया है और 835 हेक्टेयर पर अभी कार्य जारी है।
कृषि विशेषज्ञों और किसानों की भूमिका
इस सफलता के पीछे केवल सरकार की योजनाओं का ही हाथ नहीं है, बल्कि किसानों और कृषि विशेषज्ञों की मेहनत भी महत्वपूर्ण है। डॉ. दिव्या मौर्य, भूमि संरक्षण अधिकारी ने बताया कि बंजर, जल जमाव वाली भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए किसानों के आवेदन मिल रहे हैं। देसी तकनीक से ऐसी भूमि को उपजाऊ बनाया जा रहा है। किसानों को भी तकनीक की जानकारी दी जा रही है। 350 हेक्टेयर भूमि को कृषि योग्य बनाने का नया लक्ष्य मिला है, इसके लिए तैयारियां चल रही हैं।
यह भी जानें –
- 3.04 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है जिले में
- 6000 हेक्टेयर बंजर भूमि जिले में चिह्नित है
- 4020 हेक्टेयर भूमि जिले में अभी भी बंजर है