दिल्ली में शुरू हुई ‘क्लाउड सीडिंग’: मंत्री Manjinder Singh Sirsa ने बताया कैसे और कब होगी बारिश

Manjinder Singh Sirsa

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प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली में शुरू हुआ कृत्रिम बारिश का प्रयोग

राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि हवा में सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है। इसी संकट से निपटने के लिए मंगलवार को दिल्ली में पहली बार बड़े स्तर पर ‘क्लाउड सीडिंग’ की प्रक्रिया शुरू की गई।
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि क्लाउड सीडिंग का दूसरा ट्रायल सफलतापूर्वक किया गया है। यह प्रक्रिया बुराड़ी से शुरू होकर मयूर विहार तक चली। सिरसा ने बताया कि मंगलवार को दो और ट्रायल किए जाएंगे ताकि परिणामों का सही आकलन हो सके।
इस तकनीक का उद्देश्य है हवा में मौजूद प्रदूषक कणों को कृत्रिम वर्षा के माध्यम से नीचे बैठाना, ताकि हवा की गुणवत्ता सुधर सके। सिरसा ने कहा कि अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो फरवरी तक दिल्ली में नियमित क्लाउड सीडिंग की योजना लागू की जा सकती है।

आईआईटी कानपुर की निगरानी में हुआ ट्रायल, सेसना एयरक्राफ्ट से छोड़े गए रसायन

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मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो जारी कर बताया कि इस प्रक्रिया में आईआईटी कानपुर की विशेषज्ञ टीम ने सहयोग किया। क्लाउड सीडिंग सेसना एयरक्राफ्ट के माध्यम से की गई जो मेरठ की दिशा से दिल्ली में दाख़िल हुआ।
इस दौरान बुराड़ी, खेकड़ा, नॉर्थ करोल बाग़, मयूर विहार, सादकपुर और भोजपुर क्षेत्रों में रसायनों का छिड़काव किया गया। सिरसा ने बताया कि क्लाउड सीडिंग में कुल आठ फ्लेयर्स का इस्तेमाल हुआ, जिनमें से हर एक दो से ढाई किलो वजनी थी और करीब दो मिनट तक सक्रिय रही। इन फ्लेयर्स से सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड और अन्य रसायन बादलों में छोड़े गए ताकि कृत्रिम वर्षा उत्पन्न हो सके।
आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का अनुमान है कि 15 मिनट से चार घंटे के भीतर हल्की बारिश हो सकती है। हालांकि, हवा में नमी कम होने के कारण यह वर्षा सीमित रहेगी। पूरे ट्रायल की अवधि लगभग डेढ़ घंटे की रही और इस दौरान विमान ने कई बार चक्कर लगाए।

विपक्ष ने साधा निशाना, कहा “सरकार इंद्र देवता का भी क्रेडिट ले रही है”

सौरभ भारद्वाज

जहां एक तरफ दिल्ली सरकार और पर्यावरण विभाग इसे प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं, वहीं विपक्ष ने इस पर तंज कसना शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि “बीजेपी सरकार और उनके मंत्री अब इंद्र देवता के काम का भी श्रेय ले रहे हैं।”
उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि “छठ के दौरान हुई हल्की बारिश का क्रेडिट भी मंत्री जी ले सकते हैं क्योंकि इंद्र देवता तो खुद नहीं बताने आएंगे कि बारिश किसने कराई।” भारद्वाज ने कहा कि “अब सरकार यह दावा कर सकती है कि उन्होंने बारिश कराई है क्योंकि ठेकेदार को भुगतान भी करना है। अब कौन सा यंत्र बताएगा कि ये बारिश प्रकृति ने कराई या मंत्री जी ने?”
विपक्ष के इन आरोपों पर भाजपा नेताओं ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह तकनीकी प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक है और इसका उद्देश्य दिल्ली की जनता को प्रदूषण से राहत देना है, न कि किसी का राजनीतिक श्रेय लेना।

क्या है ‘क्लाउड सीडिंग’, कैसे होती है कृत्रिम बारिश

क्लाउड सीडिंग’ दो शब्दों से बना है—क्लाउड यानी बादल और सीडिंग यानी बीज बोना। सरल शब्दों में कहें तो यह बादलों में बारिश के “बीज बोने” की प्रक्रिया है। इस तकनीक में सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम क्लोराइड या सोडियम क्लोराइड जैसे रसायनों का उपयोग किया जाता है।
इन रसायनों को विमान या ड्रोन की मदद से बादलों में छोड़ा जाता है। जब ये रसायन बादलों में पानी की सूक्ष्म बूंदों को जोड़ते हैं, तो बर्फ़ के छोटे कण बन जाते हैं। ये कण आपस में मिलकर बड़े बर्फ़ीले गुच्छों में बदलते हैं, जो अंततः वर्षा के रूप में नीचे गिरते हैं।
आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर एस.एन. त्रिपाठी ने बताया था कि “जहां बादल ही नहीं हैं, वहां क्लाउड सीडिंग नहीं की जा सकती। पहले यह देखा जाता है कि बादल मौजूद हैं या नहीं, फिर उनके तापमान और नमी के आधार पर रसायनों का छिड़काव किया जाता है।”

क्लाउड सीडिंग कोई नई खोज नहीं है। इसका इतिहास 1940 के दशक तक जाता है, जब अमेरिकी वैज्ञानिक विंसेंट जे. शेफ़र ने पहली बार इसका प्रयोग किया था। इसके बाद से कई देशों ने इसे अपने यहां आजमाया है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 2021 में ड्रोन तकनीक की मदद से कृत्रिम वर्षा करवाई थी। वहां बादलों को इलेक्ट्रिक शॉक देकर वर्षा कराई गई थी। अमेरिका, चीन और ऑस्ट्रेलिया में भी इस तकनीक का उपयोग सूखे इलाकों में जल संकट से राहत पाने के लिए किया जा चुका है।
भारत में भी अब इसका प्रयोग दिल्ली जैसे महानगरों में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह प्रक्रिया सफल रहती है तो भविष्य में यह प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में एक प्रभावी समाधान बन सकती है।

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