नई दिल्ली/कोलकाता: केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद अब पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर भी देश की सियासत में नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता अनिरबन गांगुली ने सोमवार को पश्चिम बंगाल का नाम बदलने के ममता सरकार के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। गांगुली ने तर्क दिया कि ‘बांग्ला’ नाम का ऐतिहासिक रूप से कोई अलग राज्य कभी अस्तित्व में नहीं था और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जानबूझकर पश्चिम बंगाल के गौरवशाली और विभाजन से जुड़े इतिहास को मिटाने की कोशिश कर रही है।
एक समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान अनिरबन गांगुली ने राज्य के नामकरण के पीछे के ऐतिहासिक तथ्यों को विस्तार से साझा किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज इस पूरे प्रांत को ‘बोंगो’ कहते थे। यदि पुराने लेखकों और इतिहासकारों के दस्तावेजों को खंगाला जाए, तो वे इस क्षेत्र को ‘बांग्ला देश’ के रूप में संबोधित करते थे। गांगुली ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में ‘बांग्लादेश’ नाम का एक स्वतंत्र संप्रभु देश पहले से मौजूद है, ऐसे में राज्य का नाम उसी से मिलता-जुलता रखना तार्किक नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि ‘बांग्ला’ एक भाषा है और महज भाषा के आधार पर किसी राज्य का नामकरण करना उचित नहीं होगा।
ममता बनर्जी का केंद्र पर निशाना: ‘बीजेपी है बांग्ला विरोधी’
इधर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार द्वारा केरल को ‘केरलम’ नाम की मंजूरी दिए जाने पर बधाई देते हुए अपनी नाराजगी भी व्यक्त की। उन्होंने केंद्र को याद दिलाया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा ने बहुत पहले ही राज्य का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ करने का प्रस्ताव भेजा था, जो अब भी ठंडे बस्ते में पड़ा है। तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) से किए गए एक पोस्ट में मुख्यमंत्री ने बीजेपी पर ‘बांग्ला विरोधी’ होने का आरोप लगाया।
ममता बनर्जी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मन में पश्चिम बंगाल की विरासत, संस्कृति और भाषा के प्रति कोई सम्मान नहीं है। टीएमसी का तर्क है कि ‘वेस्ट बंगाल’ (West Bengal) नाम औपनिवेशिक काल की याद दिलाता है और चूंकि अब कोई ‘ईस्ट बंगाल’ अस्तित्व में नहीं है (जो अब बांग्लादेश है), इसलिए राज्य के नाम के आगे ‘वेस्ट’ शब्द लगाने का कोई औचित्य नहीं रह गया है।
उमर अब्दुल्ला ने उठाया भेदभाव का सवाल
पश्चिम बंगाल के नाम के इस विवाद में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की भी एंट्री हो गई है। मीडिया से मुखातिब होते हुए उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि केंद्रीय कैबिनेट केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे सकती है, तो पश्चिम बंगाल के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है? उन्होंने कहा कि अगर ममता बनर्जी की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से इसकी मांग की है, तो केंद्र को इसे स्वीकार करना चाहिए। अब्दुल्ला ने यह भी जोड़ दिया कि यदि भविष्य में जम्मू-कश्मीर विधानसभा भी राज्य का नाम बदलने का कोई प्रस्ताव लाती है, तो केंद्र को उस पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
इतिहास और पहचान की जंग: क्या है विवाद का मूल?
पश्चिम बंगाल के नामकरण का मुद्दा पिछले कई वर्षों से विवादित बना हुआ है। नाम बदलने के समर्थकों का कहना है कि अंग्रेजी वर्णमाला के हिसाब से ‘वेस्ट बंगाल’ का स्थान काफी नीचे आता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर की बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को बोलने का मौका बहुत देर से मिलता है। साथ ही, वे इसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखते हैं।
दूसरी ओर, विरोध करने वाले गुट का मानना है कि ‘पश्चिम बंगाल’ नाम उस ऐतिहासिक विभाजन की याद दिलाता है, जिसके तहत डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से हिंदू बहुल इस हिस्से को भारत में रखा गया था। आलोचकों को डर है कि नाम बदलने से वह ऐतिहासिक संदर्भ खत्म हो जाएगा। इसके अलावा, पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ नाम के संभावित कन्फ्यूजन को लेकर भी प्रशासनिक चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। फिलहाल, केंद्र और राज्य के बीच यह भाषाई और ऐतिहासिक रस्साकशी जारी है।
