वाराणसी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक माने जाने वाले नाटी इमली के भरत मिलाप का आयोजन इस वर्ष भारी वर्षा के बीच हुआ। बावजूद इसके, हजारों श्रद्धालु आयोजन स्थल पर पहुंचे और इस ऐतिहासिक लीला के साक्षी बने।
लगभग 400 वर्षों से लगातार आयोजित हो रही यह विश्व प्रसिद्ध लीला काशीवासियों के लिए आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। वर्षा के कारण इस बार परंपरागत महाराज हाथी की सवारी संभव नहीं हो सकी, उनकी जगह वे कार से पधारे। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह और आस्था में कोई कमी नहीं आई।
कार्यक्रम स्थल पर “हर हर महादेव” के गगनभेदी नारे और डमरू दल के वादन ने वातावरण को और भी अलौकिक बना दिया। यह अनूठा दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अविस्मरणीय अनुभव साबित हुआ।
सूर्यास्त के समय लीला का चरम क्षण, अर्थात भरत मिलाप, संपन्न हुआ। आयोजकों ने छतरियों और अन्य व्यवस्थाओं से श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखा, लेकिन भारी बारिश में लोग भीगते हुए भी पूरे उत्साह से डटे रहे।
आयोजकों और श्रद्धालुओं का कहना है कि यह पहला अवसर है जब इतनी घनघोर वर्षा के बीच भरत मिलाप संपन्न हुआ, और यह आयोजन वर्षों तक लोगों की स्मृतियों में अंकित रहेगा।
पद्मश्री देवी प्रसाद द्विवेदी ने इस अवसर पर कहा कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
बाइट: देवी प्रसाद द्विवेदी, पद्मश्री
रिपोर्टर: दीपक ज्योति त्रिपाठी, वाराणसी