उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बातों को अनसुना कर देते हैं। लेकिन अब अधिकारियों का रवैया बदलना होगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने इस मुद्दे पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कोई भी अधिकारी विधायकों का फोन उठाने में आनाकानी नहीं कर सकता। उन्होंने इसे जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि जनता की समस्याओं को हल करने के लिए अधिकारियों और विधायकों के बीच संवाद होना अनिवार्य है।
यह मामला तब गरमाया जब सदन में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय सहित कई अन्य विधायकों ने अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। विपक्ष का आरोप था कि थानेदार से लेकर उच्च स्तर के अधिकारी तक फोन नहीं उठाते, जिससे जनहित के कार्यों में बाधा आती है।
जनप्रतिनिधियों का सम्मान और अधिकारियों का रवैया
विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान अध्यक्ष सतीश महाना ने कहा कि जनप्रतिनिधियों का अपमान किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि अधिकारियों का रवैया सुधारने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं। अध्यक्ष ने साफ शब्दों में कहा कि एक विधायक हजारों-लाखों जनता की आवाज होता है, और यदि अधिकारी उसका फोन नहीं उठा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर जनता की अनदेखी है।
सतीश महाना ने सदन में घोषणा की कि अधिकारियों को न केवल फोन उठाना होगा, बल्कि उन्हें विधायकों को उचित सम्मान और समय भी देना होगा। उन्होंने यह भी अपेक्षा की कि अधिकारी जनहित से जुड़े मुद्दों पर विधायकों के साथ सकारात्मक रूप से सहयोग करें।
विपक्षी विधायकों ने उठाई आवाज
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सपा सांसद माता प्रसाद पांडेय और अन्य विधायकों ने सदन का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर खींचा। विपक्ष के नेताओं का आरोप था कि स्थानीय स्तर पर थानेदार और तहसील स्तर के सरकारी अधिकारी विधायकों की कॉल इग्नोर करते हैं। जब अधिकारियों का रवैया ऐसा होता है, तो आम नागरिक की समस्याओं का समाधान मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
नेताओं ने तर्क दिया कि फोन न उठाना केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह अधिकारियों की निरंकुशता को दर्शाता है। इसी शिकायत को गंभीरता से लेते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने यह बड़ा फैसला सुनाया है।
प्रोटोकॉल और अनुशासन का पालन जरूरी
उत्तर प्रदेश शासन में प्रोटोकॉल के तहत जनप्रतिनिधियों को विशेष स्थान दिया गया है। विधानसभा अध्यक्ष ने याद दिलाया कि अधिकारियों का रवैया सरकारी नियमावली और प्रोटोकॉल के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी जानबूझकर ऐसा व्यवहार करता है, तो इसे अनुशासनहीनता माना जाएगा।
अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि जनहित के मुद्दों पर विधायक जो भी जानकारी मांगते हैं, अधिकारियों को वह पारदर्शी तरीके से उपलब्ध करानी चाहिए। इस निर्देश के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि जिलों में तैनात अधिकारियों के व्यवहार में बदलाव आएगा और वे जनप्रतिनिधियों के प्रति अधिक जवाबदेह बनेंगे।
जनहित के मुद्दों पर सहयोग की अपेक्षा
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ी शक्ति है। विधायकों और अधिकारियों का रवैया एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से अपेक्षा की है कि वे विकास कार्यों और शांति व्यवस्था बनाए रखने में विधायकों की सलाह और सूचनाओं को गंभीरता से लें।
सतीश महाना के इस निर्देश के बाद अब शासन स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि मुख्य सचिव के माध्यम से सभी जिलों के डीएम और एसपी को इस संबंध में लिखित सर्कुलर भेजा जाएगा, ताकि अधिकारियों का रवैया सुधारा जा सके और सदन की गरिमा बनी रहे।