नई दिल्ली। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ एक बार फिर बॉलीवुड में इतिहास और राजनीति के संगम पर बहस को हवा दे रही है। यह फिल्म दर्शकों के सामने ताजमहल की कहानी एक अलग नजरिए से पेश करने का दावा करती है, लेकिन पूरी फिल्म देखने के बाद यह महसूस होता है कि कहानी से ज़्यादा यहां विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। फिल्म खुद को ऐतिहासिक सत्य की खोज बताती है, लेकिन दर्शकों को उलझा देने वाले संवाद, एकतरफा तर्क और आधे-अधूरे तथ्यों के जरिए यह ज़्यादा एक “विचार-प्रचार” जैसी लगती है।
फिल्म में परेश रावल ने विष्णु दास का किरदार निभाया है, जो पिछले 25 सालों से आगरा में ताजमहल के सरकारी गाइड के रूप में काम करता है। वह अपने बेटे अविनाश (नमित दास) के साथ मिलकर रोज़ पर्यटकों को शाहजहां और मुमताज़ की प्रेम कहानी सुनाता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब विष्णु एक कार्यक्रम में नशे की हालत में यह दावा कर देता है कि “ताजमहल शाहजहां ने नहीं बनवाया था।” यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है और यहीं से फिल्म की कहानी एक बहस में बदल जाती है — इतिहास, आस्था और राजनीति के बीच की बहस।
इस बयान के बाद फिल्म में दिखाया गया है कि विष्णु को मुस्लिम प्रबंधन समिति द्वारा नौकरी से निकाल दिया जाता है। इसके बाद वह कोर्ट में याचिका दायर करता है और ताजमहल के निर्माण पर सवाल उठाता है। यहीं से फिल्म का नैरेटिव पूरी तरह बदल जाता है। मेकर्स कोर्ट रूम ड्रामा के ज़रिए दर्शकों को तथ्यों की बजाय मान्यताओं और भावनाओं के बीच उलझाने की कोशिश करते हैं। परेश रावल का अभिनय सशक्त है, लेकिन कमजोर पटकथा और सतही डायलॉग फिल्म की गंभीरता को तोड़ देते हैं। फिल्म के कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे वह इतिहास नहीं बल्कि “सोशल मीडिया बहस” के लिए लिखे गए हों।
‘द ताज स्टोरी’ देखने पर स्पष्ट होता है कि फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों की जांच से ज्यादा अपने “विचार” को स्थापित करने की कोशिश करती है। यह वही धारा है जो पहले ‘पद्मावत’, ‘तान्हाजी’ और ‘छावा’ जैसी फिल्मों में भी नजर आई थी, जहाँ इतिहास के कुछ हिस्सों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और बाकी को अनदेखा किया गया। फिल्म में बार-बार “भारतीय सभ्यता” और “मुगल परंपरा” की तुलना की जाती है, लेकिन यह तुलना किसी ठोस तथ्य या शोध पर आधारित नहीं लगती। बल्कि यह एक निश्चित मानसिकता से उपजी प्रतीत होती है, जो इतिहास को एक ही रंग में रंगना चाहती है।
निर्देशक तुषार अमरीश गोयल की फिल्म में अच्छे सेट्स, आकर्षक सिनेमैटोग्राफी और कुछ संवादों की चमक है, लेकिन कंटेंट का आधार कमजोर है। फिल्म में कई बार ऐसा लगता है कि वह तर्क नहीं, भावनाओं के सहारे चल रही है। कोर्ट रूम के सीन में भी गंभीरता की बजाय अतिशयोक्ति हावी है। विरोधी पक्ष के वकील को इतना कमजोर दिखाया गया है कि दर्शक खुद सवाल करने लगते हैं कि क्या यह सब जानबूझकर किया गया है।
फिल्म के दूसरे भाग में जब ‘भारतीय संस्कृति बनाम विदेशी प्रभाव’ की चर्चा होती है, तब निर्देशक का एजेंडा और साफ दिखाई देता है। इतिहासकारों और विशेषज्ञों को “एकतरफा” या “शक के घेरे में” दिखाने की कोशिश होती है। एक सीन में तो एक मुस्लिम किरदार यह कहता है कि “ताजमहल हमारे समुदाय की संपत्ति है”, जिससे विवादास्पद नैरेटिव और गहरा हो जाता है। लेकिन ऐसे संवाद न तो सिनेमा को मजबूत बनाते हैं, न दर्शकों को नई जानकारी देते हैं।
सिनेमा का उद्देश्य समाज में विचार-विमर्श को आगे बढ़ाना होता है, न कि उसे और ध्रुवीकृत करना। ‘द ताज स्टोरी’ उस जगह पर चूक जाती है जहाँ उसे एक सार्थक विमर्श की ओर ले जाना चाहिए था। फिल्म इतिहास को चुनौती देने के नाम पर भ्रम फैलाती है। यह वही रास्ता है जो पिछले कुछ वर्षों में ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्मों ने भी अपनाया था — जहाँ कहानी से ज़्यादा एक विचारधारा को प्रचार का माध्यम बनाया गया।
हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह “सच” दिखाने का दावा करती है, लेकिन खुद आधे सच पर टिकी हुई लगती है। निर्देशक ने शुरुआत में चार बार डिस्क्लेमर दिखाए हैं कि “यह एक काल्पनिक रचना है”, लेकिन फिल्म की भाषा, संवाद और प्रस्तुति बार-बार वास्तविकता का भ्रम पैदा करते हैं। यही बात इसे एक विवादित मोड़ पर खड़ा करती है — जहाँ दर्शक तय नहीं कर पाते कि वे इतिहास देख रहे हैं या प्रचार।
कुल मिलाकर, ‘द ताज स्टोरी’ एक कमजोर पटकथा और एकतरफा दृष्टिकोण के कारण अपने ही दावे पर खरी नहीं उतरती। यह फिल्म ताजमहल की कहानी को नए नजरिए से दिखाने की जगह उसे विवाद का प्रतीक बना देती है। परेश रावल की सशक्त उपस्थिति भी फिल्म को बचा नहीं पाती, क्योंकि जब कहानी पक्षपात से भरी हो, तो अभिनय की ताकत भी कम पड़ जाती है।