भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और समाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण आदेश दिया है, जिसके तहत अब देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 6 से लेकर 12 तक की लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड दिए जाएंगे। इसके साथ ही, सभी स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाने और दिव्यांग छात्रों के लिए विशेष टॉयलेट की व्यवस्था भी अनिवार्य कर दी गई है। यह फैसला मासिक धर्म (Menstruation) से जुड़ी स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं के अभाव से लड़ने के लिए दिया गया है, जो कई बार लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

यह फैसला एक जनहित याचिका के बाद आया, जिसे सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर ने 2022 में सुप्रीम कोर्ट में दायर किया था। याचिका में मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने की मांग की गई थी। जया ठाकुर का तर्क था कि मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की कमी, शौचालय की अव्यवस्था और सामाजिक चुप्पी के कारण लाखों लड़कियों को अपनी शिक्षा छोड़नी पड़ती है। इसके साथ ही, मासिक धर्म को लेकर बनी सामाजिक भ्रांतियाँ और भेदभाव ने भी इस समस्या को और गहरा किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की मांग वाली याचिका पर महत्वपूर्ण गाइडलाइंस जारी की हैं।
कोर्ट ने कहा कि मेनस्ट्रुएशन हेल्थ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लड़कियों का मौलिक अधिकार है।
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— PB-SHABD (@PBSHABD) January 30, 2026
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुँच केवल एक नीति या दान का मामला नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है। यह स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है, और इसे सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने आदेश दिया कि:
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मुफ्त सैनिटरी पैड: सभी स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड(Bio-Degradable Sanitary Pad) प्रदान किए जाएंगे। ये सैनिटरी पैड स्कूल टॉयलेट्स या किसी निर्धारित स्थान पर आसानी से उपलब्ध होंगे।
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अलग शौचालय: लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था की जाएगी, ताकि लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान सुविधा मिल सके।
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दिव्यांगों के लिए शौचालय: दिव्यांग छात्रों के लिए स्कूलों में विशेष शौचालय बनाए जाएंगे, जो उनके लिए सुलभ और अनुकूल होंगे।
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शिक्षा के अधिकार की रक्षा: कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि स्कूल इस व्यवस्था को लागू नहीं करते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि मासिक धर्म स्वच्छता की सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं, तो यह शिक्षा के अधिकार को बाधित करती हैं। और जब शिक्षा पर असर पड़ता है, तो अन्य मौलिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाते हैं। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मासिक धर्म स्वच्छता का अधिकार लड़कियों के गरिमापूर्ण जीवन जीने और उनके शरीर पर नियंत्रण रखने के अधिकार का हिस्सा है।

समाज में बदलाव की दिशा में कदम
यह आदेश समाज में मासिक धर्म के बारे में बनने वाली चुप्पी और संकोच को तोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “हम हर उस लड़की से कहना चाहते हैं जो मासिक धर्म के कारण स्कूल से अनुपस्थित रही, या जिसे यह कहकर शिक्षा से दूर कर दिया गया कि उसका शरीर ‘अशुद्ध’ है, यह तुम्हारी गलती नहीं है।”
सरकार और निजी स्कूलों की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह आदेश सिर्फ सरकारी स्कूलों के लिए नहीं है, बल्कि निजी स्कूलों के लिए भी लागू होगा। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करना सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों का दायित्व है। यदि निजी स्कूल लड़कियों के लिए अलग शौचालय या मुफ्त सैनिटरी पैड की व्यवस्था नहीं करते हैं, तो उन्हें मान्यता रद्द करने का सामना करना पड़ सकता है।
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