‘मनरेगा’ (MGNREGA) का नाम बदलकर हुआ ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’… विपक्ष ने उठाए सवाल

MGNREGA

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानि मनरेगा (MGNREGA)की नई पहचान दी गई है... दरअसल केंद्र सरकार ने ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा में बड़े बदलाव को हरी झंडी दी है... साथ ही इस योजना का नाम बदलकर अब 'पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना' करने की भी मंजूरी दी है... जिसको लेकर अब सियासी बयानबाजी तेज हो गई है... इस फैसले पर कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने खड़ी दिख रही हैं...

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के नाम में बदलाव और उसकी नई दिशा पर हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा दी गई मंजूरी ने एक नया मोड़ लिया है। अब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (‘मनरेगा’) का नाम ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’ रखा गया है। सरकार ने सिर्फ योजना का नाम ही नहीं बदला है… बल्कि इसके साथ योजना के फायदों में भी बड़ा बदलाव किया है… सरकार ने रोजगार के गारंटीकृत दिनों और मजदूरी दोनों में इजाफा किया है। अब इस योजना के तहत ग्रामीण परिवारों को 100 की जगह 125 दिन रोजगार देने का वादा किया गया है। इस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद कई राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, जो इस कदम को लेकर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

क्या है MGNREGA ?

MGNREGA योजना 2005 में शुरू हुई थी। इस योजना के तहत सरकार प्रत्येक पात्र परिवार को हर वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार प्रदान करने की गारंटी देती है। इसमें कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित होती है, जिससे उनकी आजीविका को सुरक्षित किया जाता है। MGNREGA योजना को आमतौर पर नरेगा (NREGA) के नाम से भी जाना जाता है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यह अकुशल श्रमिकों को काम का अवसर प्रदान करती है, जो किसी विशेष कौशल के बिना भी काम करने के लिए तैयार होते हैं।

MGNREGA योजना का उद्देश्य

इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में रोजगार का निर्माण करना था। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में रोजगार की कमी को दूर करना, गरीबी उन्मूलन करना और ग्रामीण विकास को प्रोत्साहित करना है। यह योजना खासतौर पर ऐसे क्षेत्रों में प्रभावी रही है, जहां मजदूरी और रोजगार के अवसर बहुत कम थे। न केवल ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, बल्कि यह योजना भारत के ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक मजबूत साधन भी साबित हुई है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

हाल ही में केंद्र सरकार ने इस योजना के नाम में बदलाव का निर्णय लिया है। अब इसे ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’ के नाम से जाना जाएगा। इस बदलाव पर राजनीतिक दलों और विभिन्न नेताओं की प्रतिक्रियाएँ मिली-जुली रही हैं।

कांग्रेस पार्टी ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए इसे एक फिजूलखर्ची बताया है। प्रियंका गांधी ने इसे एक अनावश्यक बदलाव करार दिया, जिससे सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग होता है। प्रियंका गांधी के अनुसार, नाम बदलने से जुड़े हर बदलाव के लिए न केवल अतिरिक्त खर्च होगा, बल्कि इससे प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी अव्यवस्था हो सकती है। प्रियंका गांधी का कहना था कि पहले से स्थापित नाम को बदलने से देश की जनता के संसाधनों की बर्बादी होती है।

कांग्रेस पार्टी के अन्य नेताओं, जैसे सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस बदलाव की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार पहले इस योजना को कांग्रेस की विफलताओं का उदाहरण मानती थी, लेकिन अब वही योजना ग्रामीण भारत के लिए संजीवनी बन चुकी है। उनका मानना था कि इस योजना का नाम बदलने से योजना की वास्तविकता पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, और यह एक केवल नाम का खेल है।

जल संरक्षण के लिए मनरेगा फंड (MGNREGA Fund)

इस बदलाव के बावजूद, सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है, और वह है जल संरक्षण के लिए मनरेगा फंड का उपयोग। केंद्रीय सरकार ने आगामी वर्ष में देशभर में एक करोड़ जल संचय संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य तय किया है, जिसमें मंरेगा फंड का 30 से 65 प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है। इससे न केवल जल संकट का समाधान होगा, बल्कि ग्रामीण विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। खासकर डार्क जोन जिलों में, जहां जल की भारी कमी है, मनरेगा के तहत जल संरक्षण कार्यों के लिए अधिक फंड का आवंटन किया गया है।

इस योजना के तहत, विशेषकर ऐसे परिवारों को लाभ हुआ है, जो पहले कोई स्थिर रोजगार हासिल करने में असमर्थ थे। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त, यह योजना महिलाओं को भी रोजगार के अवसर प्रदान करती है, जिससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में भी वृद्धि होती है। आंकड़े बताते हैं कि MGNREGA में भाग लेने वाले अधिकांश श्रमिक महिलाएँ होती हैं, जो आर्थिक दृष्टिकोण से अपने परिवार की मदद करती हैं।

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