प्रयागराज में महर्षि दुर्वासा ऋषि जयंती का भव्य आयोजन, हवन-भंडारा और सत्संग में उमड़ा जनसागर

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प्रयागराज/झूसी ककरा दुबावल। ऋषि परंपरा, सनातन संस्कृति और वेदिक परंपराओं के उत्थान का संदेश देते हुए झूसी ककरा दुबावल में रविवार को महर्षि दुर्वासा ऋषि जयंती पर्व का भव्य आयोजन पूर्ण श्रद्धा और गरिमा के साथ संपन्न हुआ, जिसमें सैकड़ों साधु-संतों, ग्रामीणों, युवाओं और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे एक आध्यात्मिक उत्सव का रूप दे दिया। सुबह मंत्रोच्चारण और वैदिक अनुष्ठान के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, जिसके बाद पूरे दिन हवन-पूजन, सत्संग, कथा प्रवचन और भंडारा आयोजित किया गया। इस अवसर पर आए श्रद्धालुओं ने महर्षि दुर्वासा की तपस्या, ज्ञान, धर्म-संरक्षण और प्राचीन गुरुकुल परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऋषि-मुनियों की प्रेरणा भारतीय संस्कृति की आत्मा है और इसे भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सभी का दायित्व है।

समारोह की संपूर्ण व्यवस्था शिव कुमार, विश्वनाथन, अरुण मिश्र, कल्लू मिश्रा और विनय कुमार मिश्र के नेतृत्व में की गई, जिन्होंने आयोजन को भव्य और सुचारू बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही महार्षि दुर्वाषा इंटर कॉलेज के प्रबंधक एवं आयोजन व्यवस्था प्रमुखों — कल्लू मोछा, मौला मिश्रा, भोले मिश्रा, छोटू मिश्रा, राजा पुजारी, ब्रह्म किशोर मिश्र, संदीप पाला और कलेशी तिवारी — ने पूरे कार्यक्रम में सेवा और समर्पण भाव से योगदान दिया। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में आध्यात्मिक चेतना, सामुदायिक एकता और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति गर्व की भावना जागृत करना है।

पूरी दिनभर क्षेत्र में आध्यात्मिक वातावरण व्याप्त रहा। हवन की आहुति और वैदिक मंत्रों की गूंज से पूरा परिसर पवित्रता और ऊर्जा से भर उठा। भंडारे में क्षेत्रभर से आए लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया और सभी ने मिलकर महर्षि दुर्वासा के उपदेशों और जीवन चरित्र के बारे में जाना। ग्रामीणों ने इस आयोजन को समाज में नैतिकता, धर्मचेतना और संस्कारों को मजबूत करने का माध्यम बताया। श्रद्धालुओं का कहना था कि ऐसे कार्यक्रम समाज को जोड़ते हैं, सद्भाव बढ़ाते हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से परिचित कराते हैं।

आयोजन समिति ने अगले वर्ष और भी बड़े स्तर पर महर्षि दुर्वासा जयंती मनाने की घोषणा की और सभी सहयोगियों एवं उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम ने एक बार फिर साबित किया कि भारतीय संस्कृति में ऋषि परंपरा आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रही है और आध्यात्मिक आयोजनों से देश की सांस्कृतिक शक्ति और अधिक मजबूत होती है।

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