अक्टूबर माह विश्वभर में ‘स्तन कैंसर जागरूकता माह’ के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ में शनिवार को एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, छात्र-छात्राओं और आम नागरिकों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं में स्तन कैंसर से जुड़ी जागरूकता को बढ़ाना और समय पर जांच कराने की आवश्यकता पर बल देना था।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, प्रोफेसर (डॉ.) विजय कुमार, हेड ऑफ डिपार्टमेंट, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, केजीएमयू, ने अपने संबोधन में कहा,
“स्तन कैंसर से बचाव का सबसे बड़ा उपाय जागरूकता है। अगर बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाए तो मरीज की जान निश्चित रूप से बचाई जा सकती है। इसलिए, हर महिला को नियमित रूप से स्वयं की जांच करनी चाहिए और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।”
स्तन कैंसर—भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती
भारत में हर साल लाखों महिलाएं स्तन कैंसर से प्रभावित होती हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर चार में से एक महिला कैंसर रोगी स्तन कैंसर से पीड़ित होती है। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि अब यह रोग केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी तेजी से फैल रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, असंतुलित जीवनशैली, बढ़ता तनाव, अस्वस्थ खानपान और देर से विवाह या मातृत्व जैसी सामाजिक प्रवृत्तियाँ इस बीमारी के बढ़ने के प्रमुख कारणों में से हैं।
केजीएमयू में जागरूकता अभियान और चिकित्सा पहलें
कार्यक्रम के दौरान केजीएमयू के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग ने महिलाओं के लिए नि:शुल्क जांच शिविर का आयोजन भी किया। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं जांच कराने पहुंचीं। डॉक्टरों ने स्वयं परीक्षण (Self-Examination) की विधि भी प्रदर्शित की और बताया कि इसे नियमित रूप से करने से बीमारी का शुरुआती पता लगाया जा सकता है।
डॉ. विजय कुमार ने कहा कि केजीएमयू में हर वर्ष सैकड़ों नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से लगभग 60% मरीज देर से अस्पताल पहुंचते हैं। उन्होंने कहा,
“यदि महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें और किसी भी गांठ या असामान्य परिवर्तन को नजरअंदाज न करें, तो स्तन कैंसर का उपचार न केवल संभव है बल्कि सफल भी है।”
कार्यक्रम में नर्सिंग कॉलेज की प्राचार्या ने बताया कि केजीएमयू आने वाले समय में प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी जनजागरूकता अभियान चलाने की योजना बना रहा है। इसके तहत गांवों में स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षण देकर प्रारंभिक जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
अक्टूबर माह क्यों है विशेष
हर वर्ष अक्टूबर माह को विश्व स्तर पर “Breast Cancer Awareness Month” के रूप में मनाया जाता है। इस अवधि में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संस्थान कैंसर के प्रति जागरूकता, जांच और रोकथाम से जुड़े अभियान चलाते हैं। गुलाबी रिबन (Pink Ribbon) इस अभियान का प्रतीक है, जो स्तन कैंसर से जूझ रही महिलाओं के प्रति समर्थन और सहानुभूति का प्रतीक माना जाता है।
भारत में अब भी ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। कई महिलाएं शर्म या सामाजिक झिझक के कारण जांच नहीं करातीं, जिससे बीमारी बढ़ जाती है। ऐसे में स्वास्थ्य संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं और भ्रांतियों को दूर करें।
लक्षण और प्रारंभिक पहचान का महत्व
चिकित्सकों के अनुसार, स्तन में किसी भी प्रकार की गांठ, त्वचा का खिंचाव, निप्पल से स्राव या दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। प्रारंभिक चरण में ही जांच कराने से उपचार की सफलता दर 90% तक बढ़ जाती है।
साथ ही, 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को मेमोग्राफी जांच कराने की सलाह दी जाती है। डॉक्टरों ने बताया कि अब केजीएमयू में अत्याधुनिक उपकरणों के माध्यम से मेमोग्राफी और बायोप्सी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं।
महिलाओं की भूमिका और सामाजिक समर्थन आवश्यक
कार्यक्रम में उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्राओं ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि परिवार और समाज को महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। स्तन कैंसर केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक समर्थन का भी विषय है।
KGMU की प्रोफेसर सीमा सिंह ने कहा,
“महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति शर्म या डर नहीं, बल्कि गर्व और सजगता का भाव रखना चाहिए। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।”







