कानपुर का 150 साल पुराना रावण मंदिर, जो साल में सिर्फ दशहरे के दिन खुलता है

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कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित रावण मंदिर अपनी अनोखी परंपरा और रहस्यमयी धार्मिक मान्यताओं के कारण चर्चा का विषय बना रहता है। करीब 150 वर्ष पुराना यह मंदिर देशभर में अद्वितीय माना जाता है क्योंकि यहां पूजा भगवान राम या किसी अन्य देवी-देवता की नहीं बल्कि लंका नरेश रावण की की जाती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं और केवल विजयदशमी यानी दशहरे के दिन ही खोले जाते हैं। सुबह से ही भक्तों की भीड़ यहां उमड़ पड़ती है और रावण की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार और पूजन होता है। शाम को भव्य आरती के बाद फिर से मंदिर को बंद कर दिया जाता है, जो अगले साल के दशहरे तक बंद ही रहता है। मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि रावण को केवल राक्षस या बुराई का प्रतीक मानना उचित नहीं है, बल्कि वह महान विद्वान, अप्रतिम ज्योतिषी और शिव भक्त भी थे।

a temple in Kanpur Uttar Pradesh where Ravana is worshipped on  Vijayadashami know all about it ANN | Dussehra 2021: यहां होती है रावण की  पूजा, सिर्फ दशहरा पर खुलता है 150

यहां आने वाले श्रद्धालु रावण की विद्वता और ज्ञान की आराधना करते हैं और साथ ही अपने भीतर से अहंकार, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं को त्यागने का संकल्प लेते हैं। मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेई के अनुसार, रावण शक्ति और ज्ञान का प्रहरी स्वरूप हैं, इसलिए दशहरे के दिन उनकी पूजा करना आत्मबल और आत्मसंयम को बढ़ाने वाला माना जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि जिस प्रकार भगवान राम ने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय सुनिश्चित की, उसी प्रकार हमें अपने जीवन में बुराइयों पर जीत हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।

इस मंदिर में होने वाली अनूठी पूजा के कारण दशहरे के अवसर पर यहां विशेष आकर्षण रहता है और दूर-दराज से लोग यहां पहुंचते हैं। यह परंपरा लोगों को यह संदेश देती है कि हर इंसान से कुछ न कुछ सीखने योग्य होता है, चाहे वह रावण जैसा व्यक्तित्व ही क्यों न हो। इतिहासकार बताते हैं कि कानपुर का यह मंदिर भारतीय संस्कृति की विविधता और सहिष्णुता का जीवंत उदाहरण है, जहां रावण जैसे विवादास्पद चरित्र को भी ज्ञान और विद्वता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। यह मंदिर कानपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हर साल विजयदशमी पर लोगों को जोड़ता है और उन्हें यह याद दिलाता है कि अच्छाई की जीत तभी संभव है जब हम अपने भीतर छिपी बुराइयों को त्यागने का संकल्प लें।

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