नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति के मौजूदा दौर में भारत ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए यूरोपीय संघ (EU) के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) किया है। इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह न सिर्फ भारत और यूरोप के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी भारत की भूमिका को और मजबूत करेगा। इस डील के बाद जहां यूरोपीय संघ भारत के साथ अपने व्यापार को तेजी से बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है, वहीं अमेरिका की नाराजगी भी खुलकर सामने आ रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत का अमेरिका और यूरोपीय संघ—दोनों से व्यापार कितना बड़ा है और India–EU Trade Deal क्यों इतना अहम माना जा रहा है।
India–EU Trade Deal क्यों है गेमचेंजर?
भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह मुक्त व्यापार समझौता 27 यूरोपीय देशों को भारत से जोड़ता है। यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड ब्लॉक है और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दोनों के एक साथ आने से करीब 200 करोड़ लोगों का साझा बाजार तैयार होगा और यह डील दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत GDP को कवर करेगी। मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, जब दुनिया अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रही है, तब भारत–EU साझेदारी एक मजबूत तीसरे स्तंभ के रूप में उभरती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत को चीन के विकल्प के तौर पर एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब में बदल सकता है। यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत में निवेश के बड़े अवसर खुलेंगे, जिससे रोजगार, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और निर्यात क्षमता में जबरदस्त इजाफा होगा।
अमेरिका क्यों है नाराज?
India–EU Trade Deal से अमेरिका की नाराजगी भी चर्चा में है। डील से पहले ही अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि भारत के साथ FTA करके यूरोप अप्रत्यक्ष रूप से रूस–यूक्रेन युद्ध को फंडिंग कर रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने दावा किया कि यूरोप भले ही रूस से सीधे तेल खरीद कम कर चुका हो, लेकिन भारत में रिफाइन हो रहे रूसी तेल उत्पादों को खरीदकर वह युद्ध को अप्रत्यक्ष समर्थन दे रहा है। साफ है कि अमेरिका इस डील को सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी देख रहा है।
भारत–अमेरिका व्यापार: मजबूत लेकिन सीमित
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 132.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वित्त वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 119.71 अरब डॉलर था। इस दौरान भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस 40.82 अरब डॉलर रहा, यानी भारत का निर्यात आयात से कहीं ज्यादा है।
अमेरिका भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है। अप्रैल 2000 से मार्च 2025 तक अमेरिका ने भारत में 70.65 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) किया है।
वित्त वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 86.51 अरब डॉलर का निर्यात किया, जिसमें इलेक्ट्रिकल मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, मशीनरी और स्टील उत्पाद शामिल हैं। वहीं अमेरिका से भारत का आयात 45.69 अरब डॉलर रहा, जिसमें खनिज ईंधन, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण प्रमुख हैं।
हालांकि, भारत–अमेरिका FTA पर बातचीत लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस समझौता नहीं हो सका है। यही कारण है कि India–EU Trade Deal अमेरिका के लिए एक झटका माना जा रहा है।
भारत–यूरोपीय संघ व्यापार: आंकड़ों में ताकत
यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
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वित्त वर्ष 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार: 136.53 अरब डॉलर
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भारत का निर्यात: 75.85 अरब डॉलर
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भारत का आयात: 60.68 अरब डॉलर
इसके अलावा, यूरोपीय संघ भारत में सबसे बड़े निवेशकों में से एक है। अप्रैल 2000 से सितंबर 2024 तक EU का संचयी FDI 117.4 अरब डॉलर रहा है। यूरोपीय संघ को उम्मीद है कि इस FTA के बाद 2032 तक भारत को उसका निर्यात दोगुना हो जाएगा और उसे हर साल करीब 4 अरब यूरो की टैरिफ बचत होगी।
डील में क्या-क्या होगा सस्ता?
India–EU Trade Deal के तहत कई बड़े बदलाव किए गए हैं:
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97% वस्तुओं पर टैरिफ खत्म
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यूरोपीय सर्जिकल उपकरणों पर शुल्क हटेगा
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शराब पर टैक्स 150% से घटकर 20%
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कारों पर टैक्स धीरे-धीरे 10% तक आएगा
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प्रीमियम कारें, शराब और अन्य लग्जरी उत्पाद होंगे सस्ते
ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारत हर साल ढाई लाख यूरोपीय कारों के आयात पर कम टैरिफ लागू करेगा, जिससे भारतीय प्रीमियम कार बाजार में नई जान आएगी।
भारत और EU की साझा ताकत
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वैश्विक व्यापार का 25% हिस्सा
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200 करोड़ की आबादी
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EU में 8 लाख भारतीय
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100 अरब यूरो से अधिक का द्विपक्षीय व्यापार
India–EU Trade Deal भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक छलांग है। जहां भारत–अमेरिका व्यापार मजबूत है, वहीं EU के साथ यह FTA भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और निवेश के केंद्र में लाने की क्षमता रखता है। आने वाले वर्षों में यह डील भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार और वैश्विक प्रभाव—तीनों को नई दिशा दे सकती है।