क्यों इंसान अपमान को सालों तक याद रखता है, लेकिन तारीफें भूल जाता है – जानिए इसके पीछे की साइंस

Share This Article

इंसानी दिमाग की याददाश्त का रहस्य

यह सच है कि इंसान की यादें कभी-कभी दिल की गहराइयों में इतने लंबे समय तक बस जाती हैं कि सालों बीत जाने के बाद भी वो मिटती नहीं। हाल ही में आई एक स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है — इंसानी दिमाग किसी अपमान या नकारात्मक अनुभव को 20 साल तक याद रख सकता है, लेकिन तारीफें और सकारात्मक बातें सिर्फ 30 दिनों में धुंधली पड़ जाती हैं। यह तथ्य हमारे दिमाग में मौजूद एक स्वाभाविक प्रक्रिया, जिसे मनोवैज्ञानिक Negativity Bias कहते हैं, से जुड़ा है। इस सिद्धांत के अनुसार, हमारा मस्तिष्क हमें हर उस चीज़ से बचाने की कोशिश करता है जो किसी खतरे या दर्द से जुड़ी हो, इसलिए वह बुरी घटनाओं को ज़्यादा गहराई से याद रखता है।

स्टडी में क्या खुलासा हुआ

मनोवैज्ञानिक रॉय बॉमेस्टर (Roy Baumeister) की 2001 की प्रसिद्ध रिसर्च “Bad is Stronger Than Good” में बताया गया था कि इंसान की सुरक्षा प्रवृत्ति के कारण मस्तिष्क बुरी यादों को लंबे समय तक सहेजता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जब कोई व्यक्ति अपमान, अस्वीकृति या भावनात्मक दर्द महसूस करता है, तो दिमाग के दो हिस्से — Amygdala और Hippocampus — सक्रिय हो जाते हैं। Amygdala हमें उस घटना से जुड़ी चेतावनी देता है, जबकि Hippocampus उसे याद के रूप में पक्के तौर पर दर्ज कर लेता है। यही वजह है कि कोई बुरा अनुभव हमें सालों तक परेशान कर सकता है, भले ही हम उसे भुलाने की कोशिश करें।

दिमाग में कौन से हिस्से एक्टिव होते हैं

दूसरी ओर, जब हमें कोई तारीफ या खुशी मिलती है, तो मस्तिष्क में Dopamine नाम का “Feel Good” हार्मोन रिलीज़ होता है। यह हमें क्षणिक आनंद देता है, लेकिन यह प्रभाव ज्यादा देर तक नहीं रहता। जैसे ही कोई नई स्थिति या अनुभव सामने आता है, पुरानी तारीफें धीरे-धीरे दिमाग से मिट जाती हैं। यही कारण है कि सकारात्मक घटनाएं हमें उतनी गहराई से नहीं छू पातीं जितनी कोई नकारात्मक याद।

हालांकि अच्छी खबर यह है कि दिमाग को दोबारा ट्रेन (Rewire) किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, कुछ साधारण आदतें दिमाग के सकारात्मक सर्किट को मज़बूत बनाती हैं। जैसे — Gratitude Journaling (कृतज्ञता लेखन), जिसमें रोज़ तीन चीज़ें लिखी जाती हैं जिनके लिए हम आभारी हैं। यह आदत हमारे मस्तिष्क में खुशी और संतोष से जुड़ी न्यूरल कनेक्शन को सक्रिय करती है। Mindfulness Meditation या सजग ध्यान से Amygdala की सक्रियता घटती है और तनाव कम होता है। वहीं Self-Affirmations, यानी खुद से सकारात्मक बातें दोहराना — “मैं सक्षम हूँ”, “मैं बेहतर हो रहा हूँ” — हमारे आत्मविश्वास को मज़बूत करता है।

अच्छी खबर – दिमाग को दोबारा ट्रेन किया जा सकता है

विज्ञान यह भी मानता है कि अगर हम लगातार अपनी सोच को सकारात्मक दिशा में मोड़ते रहें, तो मस्तिष्क धीरे-धीरे नकारात्मक यादों की पकड़ ढीली करने लगता है। इसका मतलब यह है कि हम यह तय कर सकते हैं कि कौन सी यादें हमारे भीतर गूंजेंगी और कौन सी धीरे-धीरे मिट जाएँगी। जीवन के हर अनुभव में सबक छिपा होता है — फर्क सिर्फ इतना है कि हम उसे दर्द के रूप में याद करते हैं या सीख के रूप में।

इसलिए अगली बार जब कोई अपमानजनक घटना आपको परेशान करे, तो यह याद रखें कि आपका दिमाग सिर्फ आपकी रक्षा करने की कोशिश कर रहा है। उसे धन्यवाद दीजिए, और फिर धीरे-धीरे उसे नई दिशा दीजिए। क्योंकि तारीफें भले ही 30 दिन में भूल जाएं, लेकिन कृतज्ञता और सकारात्मक सोच को अगर रोज़ जिया जाए, तो वे ज़िंदगीभर साथ रहती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Channel

Advertisement

[wonderplugin_slider id=1]

Live Poll

Are You Satisfied DD News UP

Also Read This