कोलकाता/लखनऊ। इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 और उत्तर प्रदेश में किए जा रहे बिजली के निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का बिगुल बज गया है। ऑल इण्डिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन की कोलकाता में हुई फेडरल काउंसिल की बैठक में केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की गई कि किसानों और गरीब उपभोक्ताओं के हित में पावर सेक्टर को सार्वजनिक क्षेत्र में ही बनाए रखा जाए और प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को तत्काल वापस लिया जाए।
फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि यदि इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 और उत्तर प्रदेश में चल रही बिजली निजीकरण की प्रक्रिया को तुरंत निरस्त नहीं किया गया, तो देशभर के बिजली इंजीनियर और कर्मचारी सड़कों पर उतरकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने को मजबूर होंगे। फेडरल काउंसिल द्वारा पारित प्रस्ताव में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बिजली इंजीनियरों से निजीकरण के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़ताल की तैयारी करने का आह्वान किया गया है।
फेडरेशन ने कहा कि बिजली कर्मी किसानों और उपभोक्ताओं के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर निजीकरण के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन चलाएंगे। साथ ही आम जनता से अपील की गई है कि वे अपने हितों की रक्षा के लिए बिजली कर्मियों के आंदोलन का समर्थन करें।
बैठक की अध्यक्षता फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने की। बैठक में सेक्रेटरी जनरल पी रत्नाकर राव, पैट्रन पी एन सिंह, सीनियर वाइस चेयरमैन मौपाली मुखोपाध्याय सहित फेडरल काउंसिल के कई वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए।

फेडरेशन ने बताया कि केंद्र सरकार इससे पहले भी पांच बार इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल ला चुकी है, लेकिन बिजली इंजीनियरों, कर्मचारियों और उपभोक्ताओं के कड़े विरोध के चलते इसे पारित नहीं किया जा सका। अब छठी बार यह बिल लाया गया है। फेडरेशन का आरोप है कि इस बिल के जरिए संपूर्ण पावर सेक्टर का निजीकरण करने की कोशिश की जा रही है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि सरकारी नेटवर्क का इस्तेमाल कर निजी कंपनियां मुनाफा कमाएंगी, जबकि कृषि क्षेत्र और गरीब उपभोक्ता सरकारी कंपनियों के हिस्से आएंगे। इससे सरकारी बिजली कंपनियों का घाटा और बढ़ेगा और वे आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएंगी।
फेडरेशन ने चेताया कि इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल में सब्सिडी और क्रॉस-सब्सिडी खत्म करने जैसे घातक प्रावधान हैं, जिससे किसानों और गरीब उपभोक्ताओं को मिलने वाली राहत समाप्त हो जाएगी और बिजली दरें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएंगी।
फेडरेशन ने राज्यों को वित्तीय सहायता के नाम पर निजीकरण के लिए मजबूर किए जाने को “ब्लैकमेल” करार दिया और कहा कि इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
साथ ही उड़ीसा में बिजली निजीकरण के प्रयोगों का हवाला देते हुए कहा गया कि वहां यह मॉडल बार-बार विफल रहा है। अमेरिका की AES Corporation और रिलायंस पावर के असफल होने के बाद 2015 में लाइसेंस रद्द किए गए। बाद में टाटा पावर को वितरण लाइसेंस दिया गया, लेकिन हाल ही में उड़ीसा विद्युत नियामक आयोग ने उपभोक्ता सेवाओं में विफलता पर नोटिस जारी कर जनसुनवाई के आदेश दिए हैं।
फेडरेशन ने ट्रांसमिशन सेक्टर में टैरिफ बेस्ड कम्पटीटिव बिडिंग और एसेट मॉनेटाइजेशन के नाम पर हो रहे निजीकरण को भी वापस लेने की मांग की। साथ ही उत्तर प्रदेश में निजीकरण के विरोध में आंदोलन कर रहे बिजली कर्मियों पर की जा रही दमनात्मक कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की गई और सभी दमनात्मक कदम तत्काल वापस लेने की मांग की गई।
फेडरल काउंसिल की बैठक में केरल, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मेघालय, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के विद्युत अभियंता संघों के पदाधिकारियों ने भाग लिया।
फेडरेशन ने दो टूक कहा है कि भय और दबाव के बल पर निजीकरण नहीं होने दिया जाएगा और यदि सरकार ने अपने फैसले वापस नहीं लिए, तो देशभर में बिजली इंजीनियर और कर्मचारी निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार हैं।
