लखनऊ: समय की पटरियों पर दौड़ती भारतीय रेल सिर्फ एक परिवहन का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों भावनाओं और यादों का एक जीवंत दस्तावेज है। उत्तर प्रदेश की राजधानी का ऐतिहासिक ‘Lucknow Junction‘ रेलवे स्टेशन आज इसी गौरवशाली यात्रा के एक पड़ाव पर खड़ा है। 15 फरवरी 1926 को जब इस स्टेशन की नींव रखी गई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन यह स्टेशन न केवल परिवहन का केंद्र बनेगा, बल्कि भारतीय सिनेमा, वास्तुकला और तकनीकी क्रांति का गवाह भी बनेगा।
आज, 2026 में अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर, पूर्वोत्तर रेलवे (NER) लखनऊ मण्डल ने इसे एक ‘हेरिटेज उत्सव’ के रूप में तब्दील कर दिया है। लखनऊ जंक्शन का कोना-कोना आज अपनी कहानी खुद सुना रहा है।

सिनेमा और स्टेशन: Lucknow Junction पर एलईडी स्क्रीन में जीवंत होती फिल्मी यादें
लखनऊ जंक्शन का ‘कॉनकोर्स एरिया’ (स्टेशन का मुख्य हॉल) इन दिनों किसी सिनेमा हॉल जैसा अहसास दे रहा है। लखनऊ मण्डल की एक अनूठी पहल के तहत यहाँ एक विशाल एलईडी स्क्रीन लगाई गई है। इस स्क्रीन का उद्देश्य यात्रियों का मनोरंजन मात्र नहीं है, बल्कि उन्हें यह बताना है कि जिस प्लेटफॉर्म पर वे खड़े हैं, वहां बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों ने अपनी कला का जादू बिखेरा है।
लखनऊ परिक्षेत्र के स्टेशनों—विशेषकर लखनऊ सिटी, ऐशबाग और लखनऊ जंक्शन—पर शूट की गई फिल्मों की क्लिप्स यहाँ दिखाई जा रही हैं। ‘बरेली की बर्फी’ में आयुष्मान खुराना का वो भोलापन हो या ‘पति पत्नी और वो’ में कार्तिक आर्यन की भागदौड़, इन सभी दृश्यों ने यात्रियों को अपनी जगह पर रुकने के लिए मजबूर कर दिया है। सिद्धार्थ मल्होत्रा की ‘मिशन मजनू’ और अमिताभ बच्चन की ‘द उमेश क्रानिकल्स’ जैसी फिल्मों की शूटिंग लोकेशंस को देखकर यात्री गर्व महसूस कर रहे हैं कि उनका शहर और रेलवे स्टेशन वैश्विक पटल पर चमक रहा है।

इतिहास की खिड़की: हेरिटेज फोटो गैलरी और पुरानी यादें
स्टेशन के मुख्य द्वार पर कदम रखते ही आपकी मुलाकात एक सदी पुराने लखनऊ से होती है। यहाँ आयोजित ‘हेरिटेज फोटो प्रदर्शनी’ में ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर रंगीन तस्वीरों तक का सफर दिखाया गया है। यह प्रदर्शनी केवल चित्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उस स्थापत्य भव्यता (Architectural Grandeur) की गवाह है, जिसे आज की पीढ़ी सिर्फ किताबों में पढ़ती है।
तस्वीरों में 1926 का वो दौर दिखता है जब स्टेशन की इमारत नई-नई बनी थी, और आज का वो दौर भी है जहाँ वाई-फाई और एस्केलेटर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। यह गैलरी नई पीढ़ी को यह समझने में मदद कर रही है कि तकनीक कैसे बदली, लेकिन रेल सेवा का जज्बा वही रहा।

जब विभागों ने खोले अपने खजाने: विभागीय प्रदर्शनी
शताब्दी समारोह का सबसे ज्ञानवर्धक हिस्सा वह ‘विभागीय प्रदर्शनी’ है, जहाँ रेलवे के विभिन्न विभागों ने अपने पुराने और दुर्लभ उपकरणों को जनता के लिए प्रदर्शित किया है।
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इंजीनियरिंग विभाग: यहाँ पटरियों के रखरखाव के पुराने औजार जैसे रेल कटर, फिश प्लेट स्पैनर और हाथ से चलने वाली पुश निरीक्षण ट्रॉली रखी गई है। ये उपकरण बताते हैं कि उस दौर में रेल पटरियों की सुरक्षा कितनी मेहनत का काम थी।
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सिग्नल एवं दूरसंचार: मैकेनिकल लीवर फ्रेम और सेमाफोर सिग्नल (हाथ से उठने-गिरने वाले सिग्नल) यहाँ मुख्य आकर्षण हैं। आज के डिजिटल सिग्नलिंग के युग में ये पुरानी मशीनें जादुई लगती हैं।
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वाणिज्य विभाग: पुराने जमाने के लकड़ी के बेंच, गत्ते वाले मुद्रित कार्ड टिकट और टिकट पंचिंग मशीन देखकर बुजुर्ग यात्रियों की आंखें नम हो गईं। यह उनके बचपन की रेल यात्रा की याद दिलाता है।
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आरपीएफ का सुरक्षा कवच: रेलवे सुरक्षा बल ने अपने स्टॉल पर पुराने हथकड़ी और लाठियों के साथ-साथ आधुनिक बॉडी वॉर्न कैमरा और वॉकी-टॉकी का प्रदर्शन किया है, जो सुरक्षा के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।

102 साल का ‘बाहुबली’: जॉन फाउलर स्टीम इंजन
प्रदर्शनी का ‘शो-स्टॉपर’ कैबवे एरिया में खड़ा 102 साल पुराना नैरो-गेज स्टीम लोकोमोटिव है। इंग्लैंड की जॉन फाउलर एंड कंपनी द्वारा 1924 में निर्मित यह इंजन इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है। यह इंजन कभी महाराजगंज जिले में ट्रामवे के रूप में चलता था। इसे देखकर ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो। भाप के इंजन की वो गड़गड़ाहट और सीटी की गूंज आज भी इस इंजन को देखकर महसूस की जा सकती है।

बच्चों की मुस्कान: टॉय ट्रेन का जादू
रेलवे ने इस उत्सव में बच्चों का विशेष ध्यान रखा है। मैकेनिकल विभाग द्वारा संचालित एक विशेष ‘टॉय ट्रेन’ स्टेशन परिसर में चलाई जा रही है। एक सुंदर इंजन और दो खुले डिब्बों वाली यह ट्रेन बच्चों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय है। यह छोटा सा प्रयास बच्चों के मन में भारतीय रेलवे के प्रति प्रेम और गौरव का बीज बो रहा है।

प्रशासनिक दृष्टिकोण: डीआरएम गौरव अग्रवाल का विजन
लखनऊ मण्डल के मण्डल रेल प्रबंधक (DRM) श्री गौरव अग्रवाल ने इस शताब्दी समारोह को लेकर कहा कि लखनऊ जंक्शन का यह सफर ‘नवाचार और जनसेवा’ का प्रतीक है। उनके अनुसार, यह आयोजन सिर्फ जश्न नहीं है, बल्कि यह एक अवसर है यह बताने का कि रेलवे ने किस तरह एक सदी तक समाज के हर वर्ग को जोड़े रखा। उन्होंने जोर दिया कि हेरिटेज संरक्षण और यात्री सुविधाएं एक-दूसरे के पूरक हैं।

एक सदी की अटूट सेवा का नमन
लखनऊ जंक्शन का 100 साल का सफर केवल पटरियों और लोहे का सफर नहीं है; यह एक संस्कृति का सफर है। लखनऊ की तहजीब और भारतीय रेल की रफ्तार यहाँ आकर एक हो जाती हैं। यह प्रदर्शनी जनता और छात्रों के लिए एक खुली किताब की तरह है, जिसे पढ़कर वे अपनी विरासत पर गर्व कर सकते हैं।
भारतीय रेलवे की यह ‘शताब्दी एक्सप्रेस’ रुकने वाली नहीं है। यह आने वाले वर्षों में और भी आधुनिक, और भी तेज और और भी सुगम यात्रा का वादा करती है, लेकिन अपनी जड़ों और इतिहास को हमेशा साथ लेकर चलेगी।
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