धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)। पहाड़ी शहर धर्मशाला में आयोजित ‘धौलाधार कहानी मेला’ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच पढ़ने की आदत को फिर से ज़िंदा करने की एक अनोखी पहल बनकर उभरा है। यह मेला न सिर्फ किताबों से दोस्ती करा रहा है, बल्कि मोबाइल फोन और स्क्रीन की बढ़ती लत से बच्चों को दूर रखने में भी मददगार साबित हो रहा है।
धर्मशाला स्थित संगठन मनारा ने शहर के अन्य संगठनों के साथ मिलकर इस रीडिंग फेस्टिवल का आयोजन किया है। इसके साथ-साथ आयोजक पिछले एक साल से हर रविवार को ‘जोर से पढ़ने’ (रीडिंग अलाउड) के सेशन भी चला रहे हैं, जिसका सकारात्मक असर अब साफ दिखने लगा है।
मनारा की प्रोग्राम एसोसिएट सोनिया ने बताया कि इस मेले का उद्देश्य बच्चों में पढ़ाई के अलावा आनंद के लिए पढ़ने की आदत विकसित करना है। उन्होंने कहा कि भारतीय और तिब्बती समुदाय के लोगों की भागीदारी से यह आयोजन स्थानीय समुदायों को भी करीब ला रहा है।
“आजकल बच्चों में मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल एक बड़ी समस्या बन गया है। इस फेस्टिवल के ज़रिए बच्चे किताबों, कहानियों और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ रहे हैं। माता-पिता अब साफ तौर पर बच्चों में बदलाव देख पा रहे हैं और उनका फीडबैक हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है,” सोनिया ने कहा।
मेले में हिस्सा लेने पहुंचीं तिब्बती समुदाय की फुंगस्टोक यांगचेन ने इसे बच्चों के लिए बेहद जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए दूसरी बार का अनुभव है और वे अपने दोनों बच्चों के साथ आई हैं।
“हम माता-पिता अक्सर शिकायत करते हैं कि बच्चे हर समय स्क्रीन से चिपके रहते हैं। यह मेला उन्हें फोन से दूर रखकर किताबों और दूसरी गतिविधियों से जोड़ने का बेहतरीन जरिया है। इसके साथ ही यह भारतीय और तिब्बती समुदाय को एक-दूसरे की संस्कृति समझने का भी अवसर देता है,” उन्होंने कहा।
प्राइमरी स्कूल की छात्रा त्रियाहा ने भी मेले को मज़ेदार बताते हुए कहा कि यहां बच्चे और बड़े सभी साथ में खेलते, पढ़ते और नई गतिविधियां करते हैं। उसका मानना है कि लाइब्रेरी और कम्युनिटी स्पेस बच्चों को ज़्यादा रचनात्मक बनाते हैं।
मनारा कम्युनिटी लाइब्रेरी और ओपन कल्चरल स्पेस चलाने वाली शैली टक्कर ने बताया कि यह आयोजन निष्ठा आविष्कार, टूनाज़ बुक कैफे और धर्मशाला एनिमल रेस्क्यू जैसे संगठनों के साथ मिलकर किया गया है।
उन्होंने कहा, “यहां कॉमिक मेकिंग वर्कशॉप, रीडिंग कॉर्नर, पोएट्री कॉर्नर और अपनी कहानियां गढ़ने जैसी गतिविधियां हो रही हैं। हमारा मकसद किताबों और रचनात्मक कलाओं के ज़रिए ज़िंदगी में खुशी और बचपन का जश्न वापस लाना है।”
शैली ने स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल को मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बताते हुए कहा कि शोध यह साबित कर चुके हैं कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम से ध्यान, याददाश्त, रचनात्मक सोच और सहानुभूति प्रभावित होती है।
“अगर हमें अपने बच्चों और समाज को स्वस्थ रखना है, तो मोबाइल और स्क्रीन के विकल्पों पर गंभीरता से काम करना होगा। ‘धौलाधार कहानी मेला’ इसी दिशा में एक छोटा लेकिन मजबूत कदम है,” उन्होंने कहा।
धर्मशाला में यह मेला अब सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि किताबों, रचनात्मकता और सामुदायिक जुड़ाव की एक नई संस्कृति की शुरुआत बनता जा रहा है।


