लखनऊ। जनेश्वर मिश्र पार्क, लखनऊ में आयोजित Repertwahr Festival के दूसरे दिन ने कला, संगीत, और सांस्कृतिक उत्सव की पूरी परिभाषा को नया रूप दिया। यह दिन किसी भी आम कला महोत्सव से कहीं ज्यादा था। यहां, हर कोने में संवेदनाओं, विचारों, और रचनात्मकता की महक थी। जब शाम की सर्द हवा में विभिन्न कला रूपों का संगम हुआ, तो वह एक अद्वितीय अनुभव बन गया।
कविता: शब्दों का जादू
शब्दों से हर दिल को छूने वाले कवि बादल शर्मा ने इस आयोजन को अपनी कविताओं से रंगीन किया। उनकी कविताओं में न केवल रोज़मर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी बातें थीं, बल्कि उसमें गहरे भाव, संवेदनाएं और मुस्कान की भी झलक थी। उनकी लेखनी ने पूरे माहौल को आत्मीय बना दिया और दर्शकों को इस बात का एहसास दिलाया कि शब्द कितनी गहरी भावनाओं को छू सकते हैं। बादल शर्मा के काव्य पाठ ने लखनऊ के कला प्रेमियों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी।
![]()
लोकगीत और सूफी संगीत का संगम
इसके बाद ‘द आहवान प्रोजेक्ट‘ के लोकगीतों ने दर्शकों को अपनी धुनों से मंत्रमुग्ध कर दिया। लोक संगीत ने जीवन की सादगी और प्रेम का संदेश दिया, साथ ही आत्मचिंतन की राह भी दिखाई। इन लोकगीतों ने जीवन के जटिल सवालों का आसान जवाब संगीत के माध्यम से दर्शाया। दर्शकों ने महसूस किया कि संगीत केवल ध्वनियों का खेल नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में संवेदनाओं को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है।
![]()
थियेटर: एक दिलचस्प दास्तान
शाम के समय रंग थियेटर में अभिनेता मानव कौल द्वारा प्रस्तुत की गई संगीतमय दास्तानगोई ‘जो डूबा सो पार’ ने दर्शकों को पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह नाटक अमीर खुसरो की जीवन यात्रा, उनके गुरु निजामुद्दीन औलिया से उनके आध्यात्मिक रिश्ते, और सूफी प्रेम के संदेश पर आधारित था। निर्देशक अजीतेश गुप्ता और मोहित अग्रवाल ने इस नाटक को एक अद्वितीय रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें हिंदी और फारसी का मिश्रण दर्शकों को सूफी संगीत के अहसास में खो जाने के लिए मजबूर कर दिया। इस नाटक ने आध्यात्मिक प्रेम और समर्पण के गहरे संदेश को जीवंत रूप से दर्शाया, जिसे दर्शकों ने सराहा।
यह भी पढ़ें : Bharti Singh दूसरी बार बनीं मां, 41 की उम्र में बेटे को दिया जन्म
कॉमेडी: हंसी की बौछार
रेपर्टवा फेस्टिवल की एक और आकर्षक प्रस्तुति थी स्टैंडअप कॉमेडी, जिसमें आकाश गुप्ता ने अपनी तेज़-तर्रार टिप्पणियों और आम जिंदगी से जुड़े किस्सों के माध्यम से दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया। उनकी चुटकुलों और हंसी से भरी प्रस्तुति ने इस फेस्टिवल के रंग में चार चांद लगा दिए। उन्होंने दर्शकों को इस तरह से जोड़ा कि हंसी के ठहाके और तारीफें पूरी सभा में गूंज रही थीं। उनकी टिप्पणियों ने न केवल हंसी के पल दिए, बल्कि जीवन के साधारण पहलुओं पर एक नया दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया।
![]()
डांस और म्यूजिक का मिक्स: ताल साइलेंट डिस्को
ताल साइलेंट डिस्को स्टेज पर डीजे स्किपस्टर के हिपहॉप और इलेक्ट्रॉनिक मिक्स ने युवाओं को थिरकने पर मजबूर कर दिया। यहां एक अलग ही माहौल था, जहां लोग हेडफोन में गूंजती धुनों के साथ नाचते हुए एक नए तरह के अनुभव का आनंद ले रहे थे। यह दृश्य खुद में एक अद्वितीय आधुनिक कला प्रस्तुति सा था, जो न केवल संगीत प्रेमियों के लिए, बल्कि डांस और कला के अन्य रूपों के लिए भी दिलचस्प था। हेडफोन में संगीत सुनते हुए थिरकते कदम और उनकी ताल में एक समृद्ध सांस्कृतिक उत्सव का अहसास हो रहा था।
संगीत की ‘बारिश’
म्यूजिकल एरिना में अनुव जैन की गायकी ने सर्द रात को और भी मुलायम बना दिया। उनके कार्यक्रम ‘बारिश’ में उनकी आवाज़ ने श्रोताओं के दिलों में एक हल्की सी सरसराहट पैदा की। जब उन्होंने ‘इनाम’ गीत गाया, तो हर चेहरे पर मुस्कान और तालियों की गूंज थी। उनकी आवाज़ में एक ऐसी कोमलता और भावनात्मक गहराई थी, जो हर श्रोता को झूमने पर मजबूर कर देती थी। गीतों के बीच उन्होंने अपनी कहानियों से संगीत को और भी मानवीय बना दिया। उनके प्रस्तुतिकरण ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत केवल धुनों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह जीवन की गहरी भावनाओं और संवेदनाओं को भी व्यक्त करता है।
![]()
बच्चों और शिल्प बाजार की रौनक
फेस्टिवल में बच्चों के लिए एक ‘बचपन किड्स जोन‘ था, जहां छोटे बच्चे न केवल खेल सकते थे, बल्कि विभिन्न कला और शिल्प गतिविधियों में भी हिस्सा ले सकते थे। इसके अलावा, हस्तशिल्प बाजार ने भी दर्शकों को आकर्षित किया। यहां विभिन्न शिल्पकारों द्वारा बनाए गए अनोखे उत्पादों को देखा और खरीदा जा सकता था। फूडजोन ने दिनभर रौनक बनाए रखी और फेस्टिवल में आए लोगों को स्वादिष्ट और विविध प्रकार के व्यंजन प्रदान किए।
रेपर्टवा फेस्टिवल 2025 ने लखनऊ में कला, संगीत और संस्कृति का संगम प्रस्तुत किया, जो केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अनोखा अनुभव था। इस फेस्टिवल ने सभी दर्शकों को यह एहसास दिलाया कि कला का कोई एक रूप नहीं होता, बल्कि यह हर व्यक्ति की संवेदनाओं, विचारों और रचनात्मकता का परिपूर्ण रूप होता है। लखनऊ में आयोजित यह सांस्कृतिक उत्सव भविष्य में भी कला प्रेमियों और समाज के हर वर्ग को एक साथ लाने का जरिया बनेगा।







