पंकज चौधरी का नाम सबसे आगे, क्या पूर्वांचल की धमक से बदलेगी यूपी की सियासी बिसात?
लखनऊ/नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उत्तर प्रदेश में नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ एक बड़े राजनीतिक संदेश की तैयारी में है। लगभग 11 महीने से चल रहा इंतजार अब खत्म होने की कगार पर है, क्योंकि सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री और योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर से आने वाले पंकज चौधरी इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। उनका नाम लगभग तय माना जा रहा है और बस आधिकारिक ऐलान का इंतजार है।
पंकज चौधरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है। 7 जुलाई 2023 को गीता प्रेस की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पीएम मोदी गोरखपुर आए थे और कार्यक्रम के बाद वह पैदल चलकर पंकज चौधरी के आवास पर भी गए थे, जो उनकी केंद्रीय नेतृत्व में मजबूत पकड़ का स्पष्ट संकेत देता है।
पिछड़े वर्ग पर दांव: क्यों पंकज चौधरी की दावेदारी सबसे मजबूत?
अगले पंचायत और महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों को देखते हुए, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व स्पष्ट रूप से पिछड़े वर्ग (OBC) पर बड़ा दांव लगाने की रणनीति बना रहा है। यही वजह है कि शुरू से ही यह तय माना जा रहा था कि यूपी का अगला प्रदेश अध्यक्ष ओबीसी वर्ग से ही होगा। पंकज चौधरी की दावेदारी को मजबूती देने वाले प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
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कुर्मी फैक्टर: यादवों के बाद उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की आबादी सबसे अधिक है और इसे पारंपरिक रूप से भाजपा का वोट बैंक माना जाता रहा है। हालांकि, हालिया लोकसभा चुनाव में इस समाज के एक बड़े हिस्से ने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नाम पर समाजवादी पार्टी (सपा) का समर्थन किया था। पंकज चौधरी (कुर्मी) को अध्यक्ष बनाकर भाजपा इस महत्वपूर्ण वोट बैंक में अपनी पैठ को फिर से मजबूत करना चाहती है।
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पूर्वांचल का दबदबा: पंकज चौधरी छह बार के सांसद रह चुके हैं और गोरखपुर के डिप्टी मेयर का पद भी संभाल चुके हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ भी गोरखपुर से हैं, और पंकज चौधरी गोरखपुर मंडल के महराजगंज जिले से सांसद हैं। संगठन की कमान पंकज चौधरी को सौंपने से मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही पूर्वांचल के कद्दावर नेता होंगे, जिससे इस क्षेत्र का राजनीतिक दबदबा अभूतपूर्व रूप से बढ़ेगा।
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संगठन बनाम सरकार: पंकज चौधरी भाजपा के तीसरे कुर्मी प्रदेश अध्यक्ष बन सकते हैं (इससे पहले विनय कटियार और स्वतंत्र देव सिंह यह पद संभाल चुके हैं)। एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री को संगठन की कमान सौंपकर भाजपा यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसके लिए सरकार से बड़ा संगठन है।
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कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रियता: पंकज चौधरी को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की तरह कार्यकर्ताओं के बीच प्रिय नेता माना जाता है। वह कार्यकर्ताओं को अधिक महत्व देते हैं, जो संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
राजनीतिक जानकारों का विश्लेषण: “गोरखपुर मंडल की राजनीति में सीएम योगी आदित्यनाथ और पंकज चौधरी ही भाजपा के दो बड़े क्षत्रप माने जाते हैं। दोनों के काम करने का तरीका अलग है। एक को सरकार और दूसरे को संगठन की कमान सौंपना, यह दर्शाता है कि केंद्रीय नेतृत्व एक नए तरह के शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय समन्वय को साधना चाहता है।”
लखनऊ रवाना हुए पंकज चौधरी, हलचल तेज
आज (दिसंबर 2025) के नए अपडेट्स के अनुसार, पार्टी ने सभी प्रांतीय परिषद सदस्यों को तत्काल लखनऊ पहुंचने का फरमान जारी कर दिया है। केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी भी लखनऊ के लिए रवाना हो गए हैं, जिससे उनके नाम पर मुहर लगने की अटकलें और तेज हो गई हैं। प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के लिए जारी प्रांतीय परिषद के सदस्यों की सूची में यही सदस्य प्रस्तावक, समर्थक और मतदाता होंगे।
रेस में अन्य ओबीसी चेहरे: बीएल वर्मा और साध्वी निरंजन ज्योति की दावेदारी
पंकज चौधरी के अलावा, ओबीसी वर्ग से ही आने वाले दो अन्य बड़े नाम भी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल थे, जिनके नाम पर गंभीर चर्चा हुई:
1. बीएल वर्मा, केंद्रीय मंत्री (लोधी समाज)
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लोधी समाज का प्रतिनिधित्व: लोधी समाज की आबादी उत्तर प्रदेश में करीब $1.20$ करोड़ है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के समय से यह समाज भाजपा का मजबूत आधार रहा है। कल्याण सिंह के निधन के बाद लोधी समाज में कोई बड़ा भाजपाई चेहरा नहीं बचा है।
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नेतृत्व विकास: बीएल वर्मा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा लोधी समाज में नई और युवा लीडरशिप को विकसित करने की रणनीति पर काम कर सकती है।
2. साध्वी निरंजन ज्योति, पूर्व केंद्रीय मंत्री (निषाद समाज)
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निषाद समाज पर पकड़: निषाद समाज में भाजपा की पकड़ को कमजोर माना जाता रहा है, जिसके कारण उसे निषाद पार्टी से गठबंधन करना पड़ता है।
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एक तीर से तीन निशाने: साध्वी निरंजन ज्योति को अध्यक्ष बनाने से भाजपा एक साथ तीन राजनीतिक लक्ष्यों को साध सकती है:
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महिला वोट बैंक को मजबूत करना।
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पिछड़े वर्ग को नेतृत्व देना।
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निषाद समाज में अपनी पकड़ को मजबूत करना। साध्वी निरंजन ज्योति ने बिहार चुनाव में सह-प्रभारी और विधायक दल की बैठक में सह-पर्यवेक्षक के रूप में अपनी संगठनात्मक क्षमता को साबित किया है।
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अन्य नामों पर भी चर्चा: संतुलन साधने की कवायद
ओबीसी वर्ग से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, मंत्री धर्मपाल सिंह और राज्यसभा सदस्य बाबूराम निषाद के नाम भी चर्चा में रहे।
वहीं, ब्राह्मण वर्ग में संतुलन बनाने के लिए राज्यसभा सदस्य डॉ. दिनेश शर्मा, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के नामों पर भी अटकलें लगाई गईं, हालांकि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इसकी उम्मीद कम है।
चुनाव प्रक्रिया: निर्विरोध चयन की प्रबल संभावना
यूपी भाजपा के चुनाव अधिकारी डॉ. महेंद्र नाथ पांडे ने बताया कि केंद्रीय चुनाव अधिकारी और मंत्री पीयूष गोयल शनिवार को लखनऊ आएंगे। उसी दिन दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक पार्टी मुख्यालय पर नामांकन पत्र दाखिल किए जाएंगे। यह पूरी प्रक्रिया केंद्रीय चुनाव पर्यवेक्षक और राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े की मौजूदगी में होगी। अगले दिन, रविवार को पीयूष गोयल चुनाव की प्रक्रिया पूरी कराएंगे।
क्या मतदान होगा?
चुनाव अधिकारी ने बताया कि यदि मतदान की आवश्यकता हुई तो 84 संगठनात्मक जिलों से $380$ से अधिक प्रांतीय परिषद के सदस्य मतदान करेंगे। (हालांकि, 98 में से 14 जिलों में जिलाध्यक्ष का चयन न होने के कारण वे इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे)।
पार्टी सूत्रों का मत: “मतदान की नौबत नहीं आएगी। प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध होगा। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल परिषद की बैठक में नेता के नाम का प्रस्ताव रखेंगे, जिसका समर्थन सीएम योगी आदित्यनाथ या कोई अन्य कद्दावर नेता करेगा। इसके बाद नाम की घोषणा कर दी जाएगी।”
प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के लिए कम से कम 10 प्रांतीय परिषद सदस्यों का प्रस्तावक और समर्थक होना आवश्यक है। ऐसे में पार्टी द्वारा तय किए गए नाम के खिलाफ किसी अन्य नेता का नामांकन दाखिल करना या किसी सदस्य का विरोध में प्रस्ताव का समर्थन करना असंभव माना जा रहा है।
यूपी भाजपा की राजनीतिक दिशा: क्या संदेश देगी नई नियुक्ति?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से उत्तर प्रदेश भाजपा की आगामी राजनीतिक दिशा तय होगी:
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स्वतंत्र देव सिंह या डॉ. दिनेश शर्मा को कमान: इसे केंद्रीय नेतृत्व द्वारा आगामी विधानसभा चुनावों के लिए प्रदेश संगठन को मजबूत करने और उसे ‘फ्री हैंड’ देने के रूप में देखा जाएगा।
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केशव प्रसाद मौर्य या ब्रजेश पाठक को कमान: इसका मतलब होगा कि केंद्रीय नेतृत्व यूपी में ‘सत्ता की ताकत का संतुलन’ बनाए रखना चाहता है।
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साध्वी निरंजन ज्योति पर भरोसा: यह स्पष्ट संदेश देगा कि यूपी की आगामी राजनीति पूरी तरह से भगवामय होगी, जहां मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही भगवा वस्त्रधारी होंगे, जिससे पार्टी के हिंदुत्व एजेंडे को और बल मिलेगा।
खरमास से पहले ऐलान और मंत्रिमंडल विस्तार
प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति 15 जनवरी 2025 को होनी थी, लेकिन महाराष्ट्र, यूपी उपचुनाव और बिहार चुनाव के चलते यह मामला लगातार टलता रहा। अब, 16 दिसंबर 2025 से खरमास शुरू होने के कारण, शीर्ष नेतृत्व ने 14 दिसंबर तक प्रदेश अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया पूरी करने का निर्णय लिया है।
नए अध्यक्ष के चयन के बाद योगी सरकार $2.0$ का दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार भी किया जाएगा। पूर्व पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र सिंह चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने और पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री जितिन प्रसाद के केंद्र सरकार में मंत्री बनने से कैबिनेट मंत्री के पद खाली हुए हैं।
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सामाजिक समीकरण: आगामी पंचायत और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए कुछ जातियों, विशेषकर दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाएगा।
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पुराने मंत्रियों की वापसी/निकासी: भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को फिर से मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की संभावना है। वहीं, कुछ मौजूदा मंत्रियों, जिनके कामकाज को लेकर सरकार, भाजपा और आरएसएस के साथ-साथ कार्यकर्ताओं में नाराजगी है, उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। हालांकि, पार्टी का एक वर्ग चुनाव से ठीक पहले किसी को बाहर करने के पक्ष में नहीं है।
योगी सरकार $2.0$ का पहला मंत्रिमंडल विस्तार 5 मार्च 2024 को किया गया था, जिसमें सुनील शर्मा, दारा सिंह चौहान, रालोद के अनिल कुमार और सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह नया घटनाक्रम न केवल संगठन को मजबूती देगा, बल्कि आगामी चुनावों के लिए भाजपा की रणनीति और सामाजिक समीकरणों को भी स्पष्ट करेगा।







