भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संसद का स्थान सर्वोपरि है, और उसमें राज्यसभा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाल ही में, राज्यसभा के नए सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने पहले संबोधन में संसदीय मर्यादा और संविधान के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि हर सदस्य को संसदीय मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का पालन करना चाहिए जिससे संसद का कार्यक्षेत्र सुचारू रूप से चलता रहे और देश की उम्मीदों को पूरा किया जा सके।
सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने उद्घाटन भाषण में बताया कि राज्यसभा सिर्फ बहस का मंच नहीं है, बल्कि यह वह स्थान है जहां देश के करोड़ों नागरिकों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। ऐसे में, यह जरूरी है कि सदन के सभी सदस्य संविधान और संसदीय मर्यादाओं के तहत अपने कर्तव्यों का पालन करें। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का संविधान और राज्यसभा की नियम पुस्तिका संसदीय आचरण की ‘लक्ष्मण रेखा’ तय करते हैं। यह रेखा सदन के कार्यों को सही दिशा में बनाए रखने के लिए जरूरी है।
राधाकृष्णन ने सभी सांसदों से अपील की कि वे इस ‘लक्ष्मण रेखा’ को समझें और उस सीमा के भीतर रहते हुए अपनी बात रखें। यह भी स्पष्ट किया कि यदि सदस्य अपनी बात रखने के दौरान मर्यादा और संविधान का पालन करेंगे, तो सभापति उनकी अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम होंगे।
प्रश्नकाल और शून्यकाल की महत्व
राज्यसभा में प्रश्नकाल और शून्यकाल का बड़ा महत्व है, क्योंकि ये प्रक्रियाएं सांसदों को अपनी बात रखने और नागरिकों की समस्याओं को उठाने का अवसर प्रदान करती हैं। सी.पी. राधाकृष्णन ने इन प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि संसदीय प्रक्रियाओं का सही उपयोग लोकतंत्र को मजबूत करता है। उन्होंने सभी सदस्यों से यह अपील की कि वे इन अवसरों का रचनात्मक रूप से उपयोग करें और सदन की गरिमा बनाए रखें।
सदन के समय के सीमित होने के बावजूद, इन प्रक्रियाओं के माध्यम से सभी सदस्य अपनी बातें उठाने में सक्षम होंगे। सी.पी. राधाकृष्णन ने यह भी कहा कि संसदीय आचरण की ये प्रक्रियाएं लोकतंत्र के मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
देश की कमजोर श्रेणियों की आवाज उठाने की जिम्मेदारी
सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने भाषण में उन लोगों का जिक्र किया, जिनकी आवाज संसद में उठनी चाहिए। उन्होंने किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं, और अन्य कमजोर वर्गों का जिक्र करते हुए कहा कि राज्यसभा में होने वाली हर चर्चा उनके जीवन से जुड़ी होती है। यह संसद का कर्तव्य है कि इन वर्गों के मुद्दों पर चर्चा की जाए और उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जाए।
सदन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण को मजबूत करना है, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अन्य कमजोर वर्गों के लिए। राधाकृष्णन ने कहा कि उनकी उम्मीद है कि संसद इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएगा।
संसदीय कार्यवाही की शालीनता
राधाकृष्णन ने अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में संसद की कार्यवाही की शालीनता और जिम्मेदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जब संसद जिम्मेदारी और शालीनता के साथ काम करती है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। उनका स्पष्ट संदेश था कि संसदीय मर्यादा और लक्ष्मण रेखा का पालन किए बिना यह संभव नहीं हो सकता।
इसके साथ ही, राधाकृष्णन ने सदन के सभी सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करने का आश्वासन दिया। उनका कहना था कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी सदस्य अपने अधिकार से वंचित न रहे, लेकिन यह तभी संभव है जब सभी सदस्य संसद की मर्यादा का पालन करें।
राधाकृष्णन ने राज्यसभा के सभी सदस्यों से सहयोग की अपील की और कहा कि यह सम्मान केवल पद का नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी का है। उन्होंने विश्वास जताया कि सभी सदस्य मिलकर सदन को सुचारू रूप से चलाने में मदद करेंगे और देश के नागरिकों की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे।
अपने संबोधन के दौरान, राधाकृष्णन ने यह भी कहा कि इस सत्र में होने वाली चर्चाएं जनहित और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहेंगी। उनका यह भी कहना था कि सदन का काम सिर्फ राजनीति करने का नहीं है, बल्कि समाज के वास्तविक मुद्दों को उठाने का है, जिससे लोकतंत्र मजबूत हो सके।
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