लालू जी का बड़का लाल तेज प्रताप बोला कि हमरा भाई तेजस्वी – फेलस्वी हो गया है | Bihar Politics

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने सूबे की राजनीति को फिर एक बार नए ढंग से परिभाषित कर दिया है। लंबे समय तक हवा-हवाई दावों, सोशल मीडिया का शोर और चुनावी सभाओं की भीड़ के बाद जब परिणाम आए तो साफ दिखा कि जनता ने आख़िरी समय में मन पूरी तरह बना लिया था। एनडीए के पक्ष में पड़े भारी वोट सिर्फ जीत नहीं, बल्कि एक तरह का भरोसे का संदेश भी हैं, जिसने राज्य की राजनीति में नई दिशा तय कर दी है।

चुनाव से पहले महागठबंधन ने पूरे जोर-शोर से प्रचार किया था। तेजस्वी यादव, जिन्हें उनके समर्थक भविष्य का चेहरा बताते रहे, इस बार बदलाव की लहर का दावा कर रहे थे। हवा भी कुछ दिनों तक उनके इर्द-गिर्द बनी थी, लेकिन नतीजों ने दिखा दिया कि वह हवा ज़मीन पर उतरते ही ठहर गई। तेजस्वी अपनी सीट बचाने में तो सफल रहे, पर पार्टी की हालत बिगड़ी ही रही। आरजेडी 25 से भी कम सीटों पर सिमट गई, जो बताता है कि चुनावी भीड़ और असल वोट में कितना फासला रहता है।

बिहार में लोकल भाषा में लोग कहते हैं—“ऊपर-ऊपर से जो दिखता है, ऊ सब सच्चाई नहीं होता।” ठीक वैसा ही इस चुनाव में हुआ। महागठबंधन कई सीटों पर विश्वास से भरा हुआ दिखा, लेकिन असल लड़ाई में एनडीए का संगठन, बूथ प्रबंधन और नीतीश कुमार के शासन का ट्रैक रिकॉर्ड भारी पड़ गया।

2010 वाली बात लोग आज भी याद करते हैं, जब नीतीश कुमार की विकास यात्रा ने लालू यादव की राजनीति को बड़ा झटका दिया था। वही दृश्य इस चुनाव में कुछ बदला-बदला तो था, पर कहानी वही लगी—आरजेडी फिर सीमित, एनडीए फिर मजबूत। जनता ने यह इशारा भी दिया कि अब सिर्फ भाषण से काम नहीं चलेगा; विकास का अनुभव और स्थिर नेतृत्व ही भरोसे की असली कसौटी है।

तेजस्वी के समर्थकों में यह चर्चा खूब है कि पार्टी को अब नए सिरे से सोचने की जरूरत है। लालटेन आरजेडी का पुराना प्रतीक रहा है, लेकिन दो चुनावों से उसकी लौ कमजोर पड़ रही है। लोग मजाक में कह भी रहे हैं कि “लालटेन में तेल खत्म हो गया है, अब बल्ब का जमाना है।” बेशक यह सिर्फ व्यंग्य है, लेकिन यह भी सच है कि जनता ने इस चुनाव में लालटेन को फिर धुंधला कर दिया।

इस बार एक और चर्चा का विषय बने प्रशांत किशोर—पीके। चुनाव से पहले वे बिहार में घूम-घूमकर दावा कर रहे थे कि जनता नीतीश से नाराज़ है और जदयू मुश्किल से 25 सीट पार करेगा। लेकिन नतीजों ने उनके पूरे कैलकुलेशन को उल्टा कर दिया। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि पीके की यह गलत आकलन उनकी चुनावी समझ पर सवाल खड़ा करता है। कहा जा रहा है कि जमीन की राजनीति को सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता; लोगों की नब्ज और सूबे की हवा को पहचानना ही राजनीति की असली परीक्षा होती है।

एनडीए की जीत में मोदी-नीतीश की जोड़ी महत्वपूर्ण रही। भाजपा का आधार वोट, जदयू का संगठन और दोनों दलों के संयुक्त उम्मीदवारों की सामाजिक पकड़ इस जीत की सबसे बड़ी वजह रही। गांवों में लोगों का कहना था कि “काम बोलता है”—यह बात कई सीटों पर एनडीए के प्रदर्शन में साफ झलकी। खासकर महिला मतदाताओं और पहली बार वोट दे रहे युवा वर्ग ने एनडीए को खुलकर समर्थन दिया।

तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव बड़ा सबक माना जा रहा है। चुनाव प्रचार में उनकी ऊर्जा और भाषण शैली प्रभावशाली थी, लेकिन जमीनी रणनीति कमजोर पड़ गई। महागठबंधन के साथी दल भी उनकी मदद नहीं कर सके—कांग्रेस दहाई के अंक तक नहीं पहुंची और लेफ्ट की पकड़ भी कमजोर रही। वीआईपी की हालत तो और भी पतली हो गई, जबकि उनके नेता मुकेश सहनी खुद को डिप्टी सीएम तक का दावेदार मान रहे थे।

बिहार की राजनीति में चुनाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, सूबे की मनोदशा का भी प्रतिबिंब होता है। इस बार जनता ने साफ संदेश दिया—विकास, स्थिरता और अनुभवी नेतृत्व को प्राथमिकता मिलेगी। और इसी वजह से एनडीए की घर वापसी उतनी ही बड़ी है जितनी कि 2020 में थी।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि नीतीश कुमार सरकार आने वाले दिनों में किन प्राथमिकताओं को आगे रखती है और महागठबंधन अपनी कमजोरियों पर किस तरह काम करता है। बिहार की राजनीति हर पांच साल में एक नया मोड़ लेती है; इस बार भी ऐसा ही हुआ है। पर एक बात साफ है कि जनता ने अपने अनुभव और उम्मीद के आधार पर एक स्पष्ट जनादेश दिया है—और अब राज्य से यह उम्मीद भी करेगी कि उसके फैसले के अनुरूप विकास की रफ्तार बनी रहे।

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