Mirzapur Suicide Case : बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जहां कई घरों में खुशियां लेकर आते हैं, वहीं कभी-कभी ये गहरे जख्म भी दे जाते हैं। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जिसने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षाओं के बढ़ते दबाव पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। इस दुखद घटना में, सीबीएसई (CBSE) 12वीं की परीक्षा में फेल होने के गम में एक छात्र ने फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। घर के इकलौते चिराग के बुझ जाने से पूरे इलाके में शोक की लहर है और परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।
चुपचाप घर लौटा और बंद कर लिया कमरा
मामला कछवां कोतवाली क्षेत्र के भैसा गांव का है। यहां का रहने वाला शिवांश चौबे वीकेएस स्कूल का छात्र था। बुधवार को जब सीबीएसई इंटरमीडिएट का परिणाम घोषित हुआ, तो वह बड़े उत्साह के साथ अपना रिजल्ट देखने गया था। जानकारी के मुताबिक, जब उसने देखा कि वह परीक्षा में सफल नहीं हो पाया है, तो वह टूट गया। वह चुपचाप घर लौटा और बिना किसी से कुछ कहे अपने कमरे में चला गया। अंदर से दरवाजा बंद कर उसने बेडशीट का फंदा बनाया और पंखे के हुक से झूल गया।
मां की ममता और वो खौफनाक मंजर
शिवांश की मां को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनका बेटा इतना बड़ा कदम उठा लेगा। वह कमरे के बाहर पहुंचीं और आवाज लगाई, “बेटा, रिजल्ट देखा या नहीं?” लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। इस मार्मिक स्थिति में, जब मां ने खिड़की से झांककर देखा तो उनकी चीख निकल गई। बेटा फंदे पर लटका हुआ था। परिजनों ने आनन-फानन में दरवाजा तोड़कर उसे अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
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इकलौते बेटे की मौत से टूटा दुखों का पहाड़
शिवांश अपने पिता अनुज चौबे का इकलौता बेटा था। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए उसका जाना किसी कयामत से कम नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में ले लिया है। कछवां थाना प्रभारी अमरजीत चौहान ने बताया कि कानूनी प्रक्रिया के तहत पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम की तैयारी की जा रही है, हालांकि शोकाकुल परिजन बिना पोस्टमार्टम के शव सौंपने की मांग कर रहे हैं। पुलिस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आगे की कार्रवाई में जुटी है।
परीक्षा परिणाम और मानसिक स्वास्थ्य
यह घटना समाज के लिए एक बड़ा सबक है। अक्सर बच्चे असफल होने पर खुद को समाज और परिवार की नजरों में गिरा हुआ महसूस करने लगते हैं। इस बात की ओर इशारा करती है कि हमें अपने बच्चों को यह समझाने की जरूरत है कि एक परीक्षा का परिणाम जिंदगी का आखिरी फैसला नहीं होता। पढ़ाई का दबाव और सफल होने की होड़ कहीं न कहीं मासूमों की जान पर भारी पड़ रही है। ऐसे समय में परिवार का साथ और सहानुभूति सबसे बड़ी दवा होती है।
